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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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६० चरकसंहिता [ अ० ४ गर्भोपघातकरास्त्विमे भावाः । तद्यथा—सर्वमतिगुरूष्णतीक्ष्णं दारुणाश्च चेष्टाः । इमांश्चान्यानुपदिशन्ति वृद्धाः-देवतारक्षोऽनुचरपरि- रक्षणार्थं न रक्तानि वासांसि बिभृयान्न मदकराणि चाद्यान्यभ्यवहरेन्न यानमधिरोहेन्न मांसमश्नीयात्सर्वेन्द्रियप्रतिकूलांश्च भावान् दूरतः परि- वर्जयेद्यच्चान्यदपि किंचिल्स्त्रियो विद्युः ॥ १८ ॥ ये नीचे लिखी बातें गर्भ का नाश करनेवाली हैं। जैसे—बहुत गुरु, बहुत गरम और बहुत तीक्ष्ण सब पदार्थ ओर दारुण दु खदायी चेष्टायें गर्भ को हानि पहुँचाने वाला है। वृद्ध, ज्ञानी पुरुष नीचे लिखी बातों को भी गर्भ को हानि करने वाली बतलाते हैं। जैसे—देवों और राक्षसों के भृत्यों से बचने के लिये गर्भिणी लाल वस्त्रों को न पहिने, मद करने वाले खाद्य पदार्थों को न खावे, सवारी पर न चढ़े, मांस नहीं खावे, इन्द्रियों के प्रतिकूल सब बातों को दूर से ही छोड़ देवे। इनके अतिरिक्त और भी जिन २ बातों को वृद्ध स्त्रियो बतलावे उनको भी त्याग देव । [ जैसे—कुए में झाँकना, कोठे पर ऊँचा चढ़ना, नदी का तैरना आदि ] ॥१८॥ तीव्राया तु खलु प्रार्थनायां काममहितमप्यस्यै हितेनोपहितं दद्या- त्प्रार्थनाविनयनार्थामति । प्रार्थनासंधारणाद्धि वायुः कुपितोऽन्त. शरीर- मनुचरन् गर्भस्यापद्यमानस्य विनाशं वैरूप्यं वा कुर्यात् ॥ १९ ॥ तीव्र माग होने पर अहितकारक वस्तु भी हितकारक पदार्थ के साथ गर्भिणी को देनी चाहिये। जिससे कि माग या इच्छा या चाह को आघात न पहुँचे । क्योंकि इच्छा का विघात होने से वायु कुपित होकर शरीर के अन्दर फिरता हुआ गर्भ को नाश वा विकृत कर देता है ॥१९॥ चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्व- मधिकमापद्यते विशेषेण ॥ २० ॥ चतुर्थ मास मे गर्भ स्थिर हो जाता है। इसलिये तब से गर्भिणी का शरीर भारी हाने लगता है ॥२०॥ पञ्चमे मासि गर्भस्य मासशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण ॥ २१ ॥ पाचवे मास में गर्भ के अन्दर अन्य मासों की अपेक्षा मास और रक्त का अधिक सञ्चय होता है। इसलिये इस मास में गर्भिणी विशेष कमजोर हा जाती है ॥ २१ ॥