चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
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७२ चरकसंहिता [ अ० ५
भवत्यात्मैव सुखदुःखयो कर्ता नान्य इति, कर्मात्मकत्वाच्च हेत्वादिभि-
र्युक्तः सर्वलोकोऽहमिति विदित्वा ज्ञान पूर्वमुत्थाप्यतेऽपवर्गायेति ।
तत्र संयोगापेक्षी लोकशब्दः, षड्धातुसमुदायो हि सामान्यत-
सर्वलोकः ॥ ६ ॥
भगवान् बोले- हे अग्निवेश क्योंकि-अपने में सम्पूर्ण लोक और सम्पूर्ण
लोक में अपनी समानता देख कर 'सत्य बुद्धि' उत्पन्न होती है । सम्पूर्ण लोक
को अपने में देखने से प्रतीत होता है कि अपना आत्मा ही सुख-दुःख का
कर्त्ता है और दूसरा नहीं। कर्म के कारण यह सब कुछ होने से तथा आगे कहे
जाने वाले हेतु आदि से 'मैं सम्पूर्ण लोक हूं' ऐसा जान लेने पर ही मोक्ष के
लिये प्रथम ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यहां 'लोक' शब्द संयोग की अपेक्षा से
है। छः धातुओं का समुदाय ही सामान्यत 'सर्वलोक' है ॥ ६ ॥
तस्य हेतुरुत्पत्तिर्वृद्धिरुपप्लवो वियोगश्च । तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं,
उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनं, उपप्लवो दुःखागम । षड्धातुविभागो
वियोगः, स जीवापगमः, स प्राणनिरोधः, स भङ्गः, स लोकस्वभावः ।
तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः । प्रवृत्तिर्दुःख
निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत्सत्य, तस्य हेतुः सर्वलोकसामा-
न्यज्ञान, तत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति ॥ ७ ॥
उसके उत्पत्ति, वृद्धि, उपप्लव और वियोग ये पाच हेतु हैं। इनमें से
उत्पत्ति के कारण को 'हेतु' कहते हैं। उत्पत्ति का अर्थ 'जन्म' है। वृद्धि का
अर्थ है बढ़ना। दुःख का आना 'उपप्लव' है, छ धातुओं के विभाग का नाम
'वियोग' है, यही जीव का देह से पृथक् होजाना है। इसी को प्राण का नाश
और इसी को 'भग' कहते हैं। यह लोक का स्वभाव है। सब सुख दुःखों को
प्रवृत्ति इसका मूल कारण है। सब से उपरम निवृत्ति है। प्रवृत्ति दुःख है,
निवृत्ति सुख है। जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह सत्य है । इस सत्य ज्ञान का
कारण सम्पूर्ण लोक की समानता का ज्ञान होना है। समानता के उपदेश करने
का यही प्रयोजन है ॥ ७ ॥
अथाग्निवेश उवाच-किंमूला भगवन् ! प्रवृत्तिर्निवृत्तौ वा उपाय
इति ॥ ८ ॥
अग्निवेश ने पूछा- हे भगवन् ! ससाररूप प्रवृत्ति का कारण तथा मोक्ष
रूप निवृत्ति का उपाय क्या है ? ॥ ८ ॥
भगवानुवाच - मोहेच्छा-द्वेष-कर्म-मूला प्रवृत्तिः, तज्जा ह्यहङ्कार-
सङ्ग-संशयाभिसंप्लवाभ्यवपात-विप्रत्ययाविशेषाऽनुपायास्तरुणमिव द्रुम-