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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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७४ चरकसंहिता [ अ० ५

प्रकृति-विकार, प्रवृत्ति-निवृत्ति इनमें समानता देखना 'अविशेष' है। प्रोक्षण,
उपवास, अग्निहोत्र, तीनवार भली प्रकार स्नान, अभ्युक्षण ( जल से मार्जन ),
आवाहन, यजन, याजन, याचना ( प्रार्थना ) जल में प्रवेश या अग्नि में प्रवेश
आदि कर्म परम मोक्ष के उपाय नहीं हैं, तो भी उनका उपाय समझना यह
'अनुपाय' है।
एवमयमधी धृति-स्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्त ससशयोऽभिसंप्लु-
तबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथादृष्टिरविशेषग्राही विमार्गगतिर्निवासवृक्षः
सत्त्व-शरीर-दोष-मूलानां मूलं सर्वदुःखानां भवति । एवमहङ्कारादिभि-
र्दोषैर्भ्राम्यमाणो नानिवर्तते प्रवृत्ति, सा च मूलमघस्य ॥ ६ ॥
इस प्रकार से यह पुरुष बुद्धि, धृति और स्मृति से रहित, अहङ्कार से अह-
ङ्कारी होकर, मोक्ष से दूर करने वाले कार्यों में फस कर, कर्मफल, मोक्ष, आत्मा
आदि मे सन्देह करता हुआ, अपने को ही कर्त्ता, धर्त्ता आदि सब कुछ समझता
हुआ, 'ये मेरे मै इनका' इस ममता के गड्ढे मे गिरा हुआ, अन्यथा-दृष्टि
अर्थात् सम्यग् दृष्टि से रहित होकर, धर्म-अधर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि में
विशेष विवेक न करता हुआ, विपरीत मार्ग से चलता हुआ चित्त और शरीर
के दोषों से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों का निवास वृक्ष हो जाता है। इस
प्रकार से अहङ्कार आदि आठ दोषों के कारण चक्कर खाता हुआ प्रवृत्ति
( संसार ), से निकल नही सकता और यह प्रवृत्ति ही पाप का कारण है ॥६॥
निवृत्तिरपवर्गस्तत्परं तत् प्रशान्त तदक्षरं तद् ब्रह्म स मोक्षः । तत्र
मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः—
निवृत्ति का नाम 'अपवर्ग' है। यही परम सर्वश्रेष्ठ शान्त पद है, यही
अक्षर, यही ब्रह्म और इसी को मोक्ष कहते है। इस प्रसंग में मुमुक्षु पुरुषों के
लिये उन्नति के उपायों का उपदेश करते हैं।
तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवाऽऽचार्याभिगमन, तस्योपदे-
शानुष्ठान, अग्नेरेवोपचर्या, धर्मशास्त्रान्वगमन १, तदर्थावबोधः, तेना-
वष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनमसतां परिवर्जन, अस-
ङ्गत्तिर्दुर्जनैन, सत्य सर्वभूतहितमपरुषमनतिकाले परीक्ष्य वचन, सर्व-
प्राणिष्वात्मनीवावेक्षा, सर्वांसामस्मरणमसंकल्पनमप्रार्थनमनभिभा-
षण च स्त्रीणा, सर्वपरिग्रहत्यागः, कौपानं प्रच्छादनार्थं धातुरागनि-
वसन, कन्थासीवनहेतोः सूचीपिप्पलकं, शौचाधानहेतोर्जलकुण्डिका,
१. 'सर्वप्रवृत्तिष्ववसङ्गा' इति च पाठः ।