BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 93 of 616

Read in context
Page 93

७८ चरकसंहिता [ अ० ६ नाऽऽत्मनः कारणाभावाल्लिङ्गमप्युपलभ्यते । स सर्वकारणत्यागान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥ २० ॥ मुक्त पुरुष के इन्द्रिय आदि करण न होने से मुक्त पुरुष का कोई लक्षण नहीं मिलता । इस मुक्तात्मा पुरुष के साथ मन, इन्द्रिय आदि करणों का योग नहीं होता, इसीलिये उसको 'मुक्त' कहते हैं ॥२०॥ विपापं विरजः शान्तं परमक्षरमव्ययम् । अमृतं ब्रह्म निर्वाणं पर्यायैः शान्तिरुच्यते ॥ २१ ॥ एतत्तत्सौम्य ! विज्ञानं यज्ज्ञात्वा मुक्तसंशयाः । मुनयः प्रशमं जग्मुर्वीत-मोह-रजः-स्पृहाः ॥ २२ ॥ विपाप ( पापरहित ), विरज ( रजोगुण से रहित ), शान्त, पर, अक्षर, अव्यय, अमृत, ब्रह्म, निर्वाण, शान्ति इत्यादि पर्यायों से मोक्ष को कहते हैं । हे सौम्य ! जिस विज्ञान को जान कर संशय, मोह, रज और स्पृहा से रहित होकर मुनि लोगों ने शान्ति प्राप्त की है वह यही विज्ञान है ॥ २२ ॥ तत्र श्लोकौ-सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य पुरुषस्य च । सामान्यं मूलमुत्पत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च ॥ २३ ॥ शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी । विचये पुरुषस्योक्ता निष्ठा च परमर्षिणा ॥ २४ ॥ लोक और पुरुष की समानता, इस समानता का प्रयोजन, उत्पत्ति का कारण, निवृत्ति का मार्ग, शुद्ध सत्त्व का रूप, मोक्षसाधक सत्यबुद्धि और मोक्ष का रूप, यह सब परमऋषि आत्रेय ने इस 'पुरुष विचय' अध्याय में कह दिया है ॥ २३-२४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुष- विचयशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः । अथातः शरीरविचय शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'शरीर-विचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥