चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
Page 99 of 616
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८४ चरकसंहिता [ अ० ६
पित्तश्लेष्माणो ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपघा-
तायोपपद्यन्ते सर्वांस्तान्मले संप्रचक्ष्महे, इतरांस्तु प्रसादे, गुर्वादींश्च
द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन ॥ १५ ॥
संक्षेप से शरीर के धातु दो प्रकार के हैं। जैसे—मलरूप और प्रसाद रूप ।
इनमें जो शरीर में पीड़ा उत्पन्न करते हैं वे मलरूप हैं । जैसे—जन्म से पृथक्
या शरीर से बाहर निकलने वाले या शरीर के छिद्रों में लगे (जैसे—नाक का
मल आदि), पाक होकर पूय बने धातु (रक्त आदि), कुपित वात, पित्त, कफ
(बढे या घटे वातादि), इनके अतिरिक्त और भी जो वस्तुए शरीर मे रह कर
शरीर की नाशकारक होती हैं, उन सबको 'मल' शब्द से कहते हैं। इनसे भिन्न
वस्तुओ को 'प्रसाद' कहते हैं। गुरु से लेकर द्रव तक कहे गुणों को और रस से
लेकर शुक्र तक कहे द्रव्यों को भी प्रसाद-धातु कहते हैं ॥ १५ ॥
तेषां सर्वेषामेव वात-पित्त-श्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति
दोषस्वभावात्, वातादीनां पुनर्धातवन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टाना विविधा-
शितपीतीयेऽध्याये विज्ञानान्युक्तानि । एतावत्येव दुष्टदोषगतिर्यावत्सं
स्पर्शहीनाच्छरीरधातूनाम् । प्रकृतिभूतानां खलु वातादीना फलमारोग्यं,
तस्मादेषा प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिः ॥ १६ ॥
अपने कारणों से कुपित हुए वात, पित्त, कफ इन सबों को दूषित कर
देते हैं। क्योकि दोष का स्वभाव (प्रकृति) ही दूषित करने का है। वात
आदि और रस आदि धातुओं के दूषित होने के लक्षण 'विविधाशित
पीतीय' अध्याय मे कह दिये हैं। दुष्ट हुए वात आदि की केश, श्मश्रु
आदि में गति नहीं है, क्योंकि इनमें त्वचा का स्पर्श नहीं है। जहा जहा पर
स्पर्शेन्द्रिय का सम्बन्ध है वहा वहा पर दूषित वात आदि की गति होती है।
प्रकृति मे रहते हुए वात आदि शरीर-धातुओ का फल 'आरोग्य' है। इसलिये
बुद्धिमानों को इनको प्रकृति मे रखने का प्रयत्न करना चाहिये ॥१६॥
भवति चात्र—सर्वदा सर्वथा सर्व शरीरं वेद यो भिषक् ।
आयुर्वेदं स कात्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥ १७॥ इति ॥
जो वैद्य सम्पूर्ण शरीर को भली प्रकार सब समयों में सब प्रकारों से जानता
है, वह लोक को सुख देने वाले आयुर्वेद को भी सम्पूर्ण रूप में जानता है ॥१७॥
तमेवमुक्तवन्त भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—श्रुतमेतद्यदुक्तं
भगवता शरीराधिकारे वचः, किन्तु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते
कुक्षौ, कुतोमुखः कथं वा चान्तर्गतस्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति