छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
by कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल
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Read in contextरायगढ़ पर एक "बहुत दिनों से कोई लड़ाई नहीं हुई। इसलिए सारा शरीर शिथिल हो गया है।" ऐसा कहते हुए हंबीरराव ने ठंडे पानी का लोटा उठाया और मुँह से लगाकर गरारा किया। उन्होंने कोयना नदी के किनारे उन्होंने नीचे को देखा। सूर्योदय के साथ ही नदी के किनारे हंबीरराव की बैठक चल रही थी। पास ही किंजल वृक्षों का घना झुरमुट था। दूसरी ओर आधे कोस के फासले पर उनकी सेना का पड़ाव था। बहुत दिनों से एक ही जगह पर रुके रहने के कारण घोड़े, गधे, हाथी आदि सभी जानवर अलसाये हुए खड़े थे। कल रात बड़ी देर से हंबीरराव अपनी तलेबीड़ की हवेली से सेना में वापस लौटे थे। प्रतिदिन 2000 दंड बैठक निकाले बिना हंबीरराव के शरीर में स्फूर्ति नहीं आती थी। दंड निकालते समय उनका तरीका कुछ अलग ही था। जब दंड निकालते समय जमीन पर नाक रखकर शरीर को ऊपर उठाते थे तो कोई पन्द्रह सोलह वर्ष का लड़का उनकी दोनों एड़ियों पर खड़ा हो जाता था। दंड करते समय वह लड़का हंबीरराव की लँगोट के साथ बँधी चाँदी की करधनी को पकड़े रहता था। अपनी पीठ पर यह बोझ सँभाले घंटाभर दंड निकालते रहते थे। इस दीर्घ व्यायाम से जब उनका सीना फूल आता और उनके शरीर से पसीने की धार बहने लगती तब कहीं उन्हें हल्कापन अनुभव होता था। हंबीरराव ने अपनी तलवार के बल पर बड़ी प्रसिद्धि अर्जित की थी। उनके नाम के साथ एक कीर्ति वलय बन गया था। कृष्ण और कोयना के तट के दूध पर पले पुसे हंबीरराव सागौन के तने की तरह लम्बे थे। उनकी कड़ी ऐंठी मूंछें थीं, गर्दन मोटी और मजबूत थी। पूरा शरीर सशक्त था। उनका व्यक्तित्व रोबदार दिखाई पड़ता था। नेसरी की लड़ाई में प्रताप राव गुजर अपनी जिद के कारण अपने साथियों के साथ बहलोलखान के विशाल सेना सागर में कूदकर डूब गये थे। पीछे बच गये सम्भाजी 187