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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४२१

चतुर्थे हिरण्यप्रतिग्रहाय हस्तं प्रसारयन्नेवोत्तिष्ठति । पञ्चमे मन्त्रचिन्तया महान्तमायागमनुभवति । तत्रापि मन्त्रिणो मध्यस्था इवान्योन्यं संभूय, दोषगुणौ दूतचारवाक्यानि शक्याशक्यतं देशकालकार्यावस्थाश्च स्वेच्छ- या विपरिवर्तयन्तः, स्वपरमित्रमण्डलान्युपजीवन्ति । बाह्याभ्यन्तरांश्च को- पान् गूढमुत्पाद्य प्रकाशं प्रशमयन्त इव स्वामिनमवशमवगृह्णन्ति । (११) षष्ठे स्वैरविहारो मन्त्रो वा सेव्यः । सोऽस्यैतावान्स्वैरविहार- कर्माणि । विपरिवर्तयन्तः विपर्यासयन्तः । दोषं गुणरूपेण गुणं च दोषरूपेणेत्यर्थः । दूतचारवाक्यादीन्यपि तथैव । स्वपरेति स्वस्य परस्य मित्राणाञ्च मण्डलानि उप- जीवन्ति आश्रयन्ते । तेभ्योऽपि धनं गृह्णन्ति । बाह्यान् प्रजाः, आभ्यन्तरान् अमा- त्यादींश्च । प्रशमयन्तः शान्तिं प्रापयन्तः । अवगृह्णन्ति अनाद्रियन्ते । (११) स्वैरविहारः स्वच्छन्दविहरणम् । त्रिपादोत्तराः त्रिपादाधिकाः । नाडिकाः घटिकाः । चतुरङ्गबलस्य हस्त्यश्वरथपदातिलक्षणस्य, प्रत्यवेक्षणं परीक्षणं तस्य प्रयासः क्लेशः । सेनापतिसखस्य सैन्याध्यक्षेण सहेत्यर्थः । शस्त्राग्नीति- शस्त्रेण अग्निना रसेन विषेण च हन्तारः, प्रणिधयो गुप्तदूताः । अनुष्ठेयाः कर्त्तव्या खूब धन पैदा करते हैं। नित्य ही राजकाजमें संलग्न रहनेसे राजाओंको नहाने-खाने तकका समय नहीं मिलता है। तीसरी बात-यदि भोजन ठीकसे मिला भी तो उसके ठीकसे न पचनेतक यह चिन्ता बनी रहती है कि कहीं किसीने विष तो नहीं मिला दिया। इसी प्रकार चौथी बात-नित्य ही धनप्राप्तिकी अभिलाषा लिये हुए सोकर उठना पड़ता है। पाचवीं बात-विचार विमर्शकी रात-दिन चिन्ताएँ लगी रहती हैं और उनसे बड़ा क्लेश होता है। इसपर भी सचिवगण मध्यस्थ बनकर राजदूतों और गुप्तचरोंकी बातोंके अनेक दोष-गुण, सबलता-निर्बलता तथा देश-कालकी स्थितिमें मनमाने परिवर्तन करके अपना और अपने साथियोंका कार्य साधा ही करते हैं। वाह्य एवं आन्तरिक चर्चायें वे लोग राजाओंका सुनाते हैं तथा कभी कभी क्रोधसे परिपूर्ण भी राजाओंको कर देते हैं। यद्यपि ऊपर-ऊपर से वे लोग राजाओंके क्रोधकी शान्ति चाहते हैं परन्तु, वास्तविकमें वे लोग राजाओंको क्रोधाभिभूत तथा मतिहीन करके सदा अपने वशमें किये रहना चाहते हैं और किये रहते भी हैं। (११) छठी बात-मनुष्य या तो स्वेच्छापूर्वक विहार कर सकता है या सम्मति आदि परामर्श का बोझ उठा सकता है। दोनों बातें एक ही व्यक्ति नहीं कर सकता। परन्तु उन धूर्त मन्त्रिगणोंकी यह नीति रहती है कि राजाओंको दो-तीन घड़ीसे अधिक स्वेच्छाविहार करनेका समय ही नहीं प्राप्त होता है-इतने झमेलेमें वे फँसाये रहते हैं।

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu