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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४१ न्तभानुश्च तत्कोशवाहनमवशीर्णमात्माधिष्ठितमेव कृत्वा 'यथान्यासं यथाबलं च विभज्य गृह्णीत । युष्मदनुज्ञया येनकेनचिदंशेनाहं तुष्यामि' इति शाठ्यात्सर्वानुवर्ती, तेनैवामिषेण निमित्तीकृतेनोत्पादितकलहः सर्व- सामन्तान्ध्वंसयत् । तदीयं च सर्वस्वं स्वयमेवाग्रसत् । वानवास्यं केन- चिदंशेनागृह्य प्रत्यावृत्य सर्वमनन्तवर्मराज्यमात्मसादकरोत् । (२७) अस्मिंश्चान्तरे मन्त्रिवृद्धो वसुरक्षितः कैश्चिन्मौलैः संभूय बालमेनं भास्करवर्माणम् , अस्यैव ज्यायसीं भगिनीं त्रयोदशवर्षां मञ्जु- वादिनीम् , अनयोश्च मातरं महादेवीं वसुंधरामादायापसर्पन्नापदोऽस्या आवितया दाहज्वरेण देहमजहात् । अस्मादृशैर्मित्रैस्तु नीत्वा माहिष्मतीं परदिने । नयद्वेषात् दुर्नयात् । आमिषत्वं भोग्यवस्तुत्वम् । तैर्हत इति भावः । तत्कोशेति-तस्यानन्तवर्मणः कोशवाहनं धनरत्नगजाश्वादिकम् । अवशीर्णं विध्व- स्तम् । आत्माधिकृतं स्वाधिकृतम् । यथाप्रयासं स्वस्वचेष्टानुरूपम् । यथाबलं स्वस्वशक्त्यनुसारेण । सर्वानुवर्त्ती सर्वेषां मनोरञ्जकः । (२७) मौलैः भूयादिमूलज्ञातृभिः । 'मुखिया' इति भाषा । भास्करवर्मा विश्रुतेन पूर्वदृष्टाऽष्टवर्षदेशीयो बालकः अनन्तवर्मणः पुत्रः । ज्यायसीं ज्येष्ठांम् । अधिकारमें कर लिया तथा लोगों से कहा—'आप लोग अपनी शक्तिके और परिश्रमके अनुसार इसमें से हिस्सा बाँट कर लें । हमें आप लोग जो प्रसन्नतासे देंगे वही लेने में हम राजी हो जायेंगे—हमें कोई आपत्ति नहीं है । इस प्रकार के भुलावे दे देकर वसन्तभानुने सबको अपनी ओर राजी कर लिया । परन्तु बटवारेमें से सब सामन्त परस्पर झगड़ गये । वसन्तभानुने ऐसे मौके से लाभ उठाया और सभी सामन्तोंको मार डाला । तदनन्तर उन सबके समस्त धनको उसने ले लिया। मीलोंके अधिपति को जो उसका मित्र था उसमेसे हिस्सा दे दिया और वहां से लौटकर बेखटके अनन्तवर्मा के सारे साम्राज्य पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया । (२७) इसी बीचमें सचिवोंमें श्रेष्ठ वसुरक्षित इस आपत्तिसे व्याकुल होकर कुछ पुराने दासोंको लेकर तथा अपनी त्रयोदशवर्षीया भगिनी मंजुवादिनी एवं अपनी माता महादेवी वसुन्धराके साथ भागा । परन्तु, थोड़े ही दिनों पश्चात् वह ज्वरपीड़ित होकर मर गया । तब कुछ सुहृदोंने बालकोंके साथ महादेवी वसुन्धराको उसकी सौतके पुत्रके समीप भेजवा दिया । किन्तु, उस सुचरित्रा विमाता को उसने भ्रष्टाचारिणी समझा और यह भी सोचा कि सम्भव है विमाता का विचार अपने पुत्र को राजा बनाने का होवे । इस बात का विचार कर वह बहुत घबराया तथा इसी विचार से मित्रवर्मा