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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४५७ दिनी तस्य द्विजातिदारकस्य दारत्वेनैव कल्पिता' इति । तदेतदतिरहस्यं युष्मास्वेव गुप्तं तिष्ठतु यावदेतदुपपत्स्यते' इति । ( ३० ) स सांप्रतमतिप्रीततः प्रयातोऽर्थश्चायं यथाचिन्तितमनुष्ठितोऽ- भूत् । प्रतिदिशं च लोकवादः प्रासर्पत्—'अहो माहात्म्यं पतिव्रतानाम् । असिप्रहार एव हि स मालाप्रहारस्तस्मै जातः । न शक्यमुपधियुक्तमेत- त्कर्मेति वक्तुम् । यतस्तदेव दत्तं दाम दुहित्रे स्तनमण्डनमेव तस्यै जातं न मृत्युः । योऽस्याः पतिव्रतायाः शासनमतिवर्तते स भस्मैव भवेत्'इति । ( ३१ ) अथ महाव्रतिवेषेण मां च पुत्रं च भिक्षायै प्रविष्टौ दृष्ट्वा प्रस्नुतस्तनी प्रत्युत्थाय हर्षाकुलमब्रवीत्—'भगवन्, अयमञ्जलिः । ताम् । अतिरहस्यमतिगोपनीयम् । यावत् यत्काळपर्यन्तम् । उपपत्स्यते सिद्धं भविष्यति । ( ३० ) सः नालीजंघः । अर्थः मदुक्तो विषयः । प्रासर्पत् प्राचरत् । तस्मै तदर्थम् मित्रवर्मणे इत्यर्थः । उपधियुक्तं कपटायुक्तम् । दाम माला । अतिव- र्त्तते लंघयति । ( ३१ ) महाव्रतिवेषेण कापालिकच्छद्मना । भिक्षायै भिक्षार्थम् । प्रस्नुतस्तनी स्रवत्पयोधरा । यद्येवं भवद्वचनं सत्यं स्यात् । अस्याः ममेत्यर्थः । अस्याः कुमार की परिणीता भार्या होगी । हमने जो मद्गुप्त की बात बतायी है, उसे तब तक आप लोग गुप्त रखें जब तक यह बात ठीक न हो जाय । ( ३० ) इन बातों को सुनने के पश्चात्—वह बूढ़ा नालीजंघ अति आनन्द के साथ विदा हुआ तथा हमने जो योजनाएँ बनायी थीं उसने उन्हें सम्पादित भी कर दी । अब चारों ओर यह हल्ला हो गया कि, 'देखो पातिव्रत धर्म की कितनी बड़ी महिमा है कि देवी ने मित्रवर्मा पर माला का प्रहार किया और वह प्रहार उसके लिए खङ्ग प्रहार हो गया। यदि यह कहा जाय कि उक्त माला में कोई विष मिला था तो ऐसी कल्पना करना भी भ्रममात्र है, क्योंकि उसी माला द्वारा मित्रवर्मा को मारकर देवी ने वही माला मंजुवादिनी को दे दी है और उसने तुरन्त धारण भी कर लिया । परन्तु वह तो न मरी अपितु, वह माला उसके स्तनों की भूषण बन गयी अतः जो कोई भी इस पतिव्रता की आज्ञाओं को न मानेगा वह जलकर भस्म हो जायगा।' ( ३१ ) तदनन्तर हम उसके साथ संन्यासियों का रूप धरकर उसके यहाँ भिक्षा माँगने गये । हम दोनों को देखकर वह अति हर्षित हुई। उसके स्तनों से दुग्ध की धारा बह चली । वह गद्गद स्वर में बोली—'हे भगवन् ! मैं आपसे हाथ जोड़कर विनय Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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