दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
by महाकवि दण्डी
Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)
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सुताभ्युदयाभिलाषिण्य इदानीं च पुनर्मया दानमानाद्यावर्जनेन विश्वासिता। विशेषेण राजपुत्रमेवाभिकाङ्क्षन्ति । अश्मकेन्द्रान्तरङ्गाश्च भृत्या मदी- यैर्विश्वास्यतमैः पुरुषैः प्रभूतां प्रीतिमुत्पाद्य मदाज्ञया रहसीत्युपजप्ताः— 'यूयमस्मन्मित्राणि, अतोऽस्माकं शुभोदर्कं वचो वाच्यमेव । अत्र भवा- न्या राजसूनोः साहाय्यकाय विश्रुतं विश्रुतं नियुज्य तद्धस्तेनाश्मकेन्द्रस्य वसन्तभानोस्तत्पक्षे स्थित्वा ये चानेन सह योत्स्यन्ति तेषामप्यन्तकाति- थिभवनम् । यावदश्मकेन्द्रेण स जन्यवृत्तिर्न जातस्तावदेनमनन्तवर्मतन- यं भास्करवर्माणमनुसरिष्यथ । स वीतभयो भूयसीं प्रवृत्तिमासाद्य सपरि
करणेन वशीकरणेनेति यावत् । प्रभूतामत्यधिकाम् । रहसि एकान्ते । इति वक्ष्यमाणप्रकारम् । उपजप्ताः भेदिताः । शुभोदर्कं कल्याणपरिणामकम् । वाच्यं कथनीयमस्माभिरिति शेषः । विश्रुतं प्रख्यातम् । विश्रुतं तदाख्यम् । तद्धस्तेन विश्रुतद्वारा । अनेन विश्रुतेन । अन्तकस्य यमस्य अतिथिभवनं यमालयग मनम् । यावत् यत्कालपर्यन्तम् । स विश्रुतः । जन्यवृत्तिः युद्धप्रवृत्तः सः यो
पुत्र है भवानीके अनुग्रहसे अवश्य इस राज्यको प्राप्त करेगा।' अश्मकेन्द्रकी सेना भी, राजपुत्रके विषयमें कि, उन्हें भवानीकी सहायता है, ऐसा ज्ञात करके, कहती है 'दैवी- शक्तिके आगे मानुषी शक्ति बलवती नहीं होती है' अतः अवश्य युद्धावसरपर वह भयभीत दिखायगी । यहाँकी प्रधान प्रजा पहिलेसे ही राजपुत्रका अभ्युदय चाहती है और अब तो, मेरेद्वारा दान-सम्मानसे विश्वसित हो, विशेषतया राजपुत्रकी ही उन्नति चाहती है। अश्मकेन्द्रके जो अन्तरङ्ग सेवक हैं वे मेरे विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा प्रगाढ़ प्रीतिको प्राप्तकर एकान्तमें इस तरह भेदभाव करा देंगे अर्थात् अपनी सेनावालोंसे गुप्त रीतिसे कहेंगे—'हे मित्रो ! आप लोग मेरे सखा हैं, अत एव हमारा कर्त्तव्य है आपसे श्रेयस्करी बातें कह दें । इस राजपुत्रकी सहायता के लिये भवानीने विश्रुतकुमारको नियुक्त किया है यह बात सर्वथा प्रसिद्ध ही है। अतः उसके द्वारा नियुक्त होकर जो वीर, अश्मकेन्द्र वसन्तभानुके पक्षमें होकर भी, इसके साथ युद्ध करेगा, वह यमराजके घरका अतिथि होगा । जबतक अश्मकेन्द्रके साथ यह राजपुत्र युद्ध-प्रवृत्त नहीं हुआ है तबतक आप लोग अनन्तवर्माके पुत्र भास्करवर्माका अनुसरण कर लें। जो लोग ऐसा कर लेंगे वे निर्भय होकर प्रचुर आदर पाकर परिजन सहित सुखसे जीवन व्यतीत करेंगे। जो इसके विरुद्ध करेंगे वे भवानीके त्रिशूलके वशीभूत होंगे—मर जायंगे । भवानीने मुझे यह विज्ञप्ति दी है कि मैं आप लोगोंको एक बार उपर्युक्त सूचना दे दूं । मेरी आप लोगोंके साथ मित्रता है अतः मेरे मुखसे (मेरे माध्यमसे) यह बात कहलायी गयी है।'