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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

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१८० दशकुमारचरितम्। [ पूर्वपीठिकायां पुरमगच्छन् । राजवाहनोऽपि यत्र हृदयवल्लभावलोकनसुखमलभत तदु- द्यानं विरहविनोदाय पुष्पोद्भवसमन्वितो जगाम । तत्र चकोरलोचनाव- चितपल्लवकुसुमनिकुरम्बं महीरुहसमूहं शरदिन्दुमुख्या मन्मथसमाराध- नस्थानं च नतांगीपदपङ्क्तिचिह्नितं शीतलसैकततलं च सुदतीभुक्तमुक्तं माधवीलतामण्डपान्तरपल्लवतल्पं च विलोकयंल्ललनातिलकवलोकन- वेलाजनितशेषाणि स्मारंस्मारं मन्दमारुतकम्पितानि नवचूतपल्लवानि मदनाग्निशिखा इव चकितो दर्शदर्शं मनोजकर्णेजपानामिव कोकिलकीर- मधुकराणां कूजितानि श्रावंश्रावं मारविकारणैः क्वचिदप्यवस्थातुमंसहिष्णुः परिवभ्राम । (२३) तस्मिन्नवसरे धरणीसुर एकः सूक्ष्मचित्रनिवसनः स्फुरन्मणि- सा तथा। अवचितानि छिन्नानि पल्लवानां कुसुमानाञ्च निकुरम्बाणि समूहा यस्य तम्। नताङ्ग्या अवन्तिसुन्दर्याः पदपङ्क्त्या चरणचिह्नेन चिह्नितम्। सुदत्या आदौ भु- क्तमुपभुक्तं पश्चान्मुक्तं त्यक्तम्। माधवीलतामण्डपस्यान्तरे मध्ये यत्पल्लवतल्पं किस- लयशय्या तत् । ललनातिलकस्य कामिनीभूषणभूताया अवन्तिसुन्दर्या विलोकन- वेलायां दर्शनसमये जनित उत्पादितः शेषो येषां तथाभूतानिव वाक्यानीति शेषः। मनोजस्य कामस्य कर्णेजपा मन्त्रिणः सहायास्तेषाम् । कमोद्दीपकानामित्यर्थः । (२३) धरणीसुरो ब्राह्मणः । सूक्ष्मं श्लक्ष्णं चित्रं नानावर्णं निवसनं वासो राजपुत्रीके अन्तःपुरमें वापस आ गये। राजपुत्र राजवाहन वहांसे उठकर वियोगजनित व्यथाके निवारणार्थ केलिवनके उस स्थानपर मनोरञ्जनार्थ चले गये जहाँपर राजकुमारीके प्रथम-प्रथम दर्शन हुए थे और उन्हें आनन्द मिला था। पुष्पोद्भवभी उस समय उनके साथ था। वहाँ चकोर के समान नयनोंवाली अपनी प्रियतमा अवन्तिसुन्दरी द्वारा इकट्ठे किये हुए पुष्पों, पत्त्रों और वृक्षोंके समूहोंको देखकर उस चन्द्रवदना द्वारा कियां हुआ काम- पूजनका स्थान देखा। फिर उस नतांगी कुमारीके पदचिह्नोंसे विभूषित वालुकामय प्रदेश तथा उस सुन्दर दाँतवाली कुमारीके द्वारा उपभुक्त माधवी लतामण्डपके आभ्यन्तरिक स्थान में पड़ी पत्त्रोंकी शय्याको देखा। तब प्रथम दर्शनपर उस सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी द्वारा किये गये हाव-भावोंको संस्मरण करके मन्द-मन्द बहनेवाली हवाके झोकोंसे काँपते हुए आम्रोंको देखा। इन नवीन पेड़ोंके पत्तोंको कामाग्निकी ज्वाला जानकर तथा कामदेवके गुप्तचर कोयल सुग्गे और भौंरोंकी ध्वनियोंको सुनता हुआ वह आश्चर्यान्वित होकर कामदेवकी व्यथासे व्यथित होकर विह्वल हो गया और उस उपवनमें विश्राम करनेमें अशक्त होकर इतस्ततः पर्यटन करने लगा । (२३) उसी अवसरपर महीन तथा रंगीन वस्त्रधारी एक विप्र वहाँ आ पहुंचा। उसके