BharatKosha
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

Page 309 of 889

Read in context
Page 309

| ३०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |

| यत्र साक्षाद्धरिः कृष्णो यादवेन्द्रो महामनाः।<br>ब्राह्मणाः पूर्णविद्याश्च भारद्वाजादयस्तथा॥ ११<br><br>कृत्वा यज्ञं सुसम्पूर्णं मासमात्रेण पाण्डवैः।<br>प्राप्तं महत्तरं कष्टं वनवासश्च दारुणः॥ १२ | जिसमें महामनस्वी यादवेन्द्र साक्षात् भगवान् कृष्ण विद्यमान थे और भारद्वाज आदि पूर्णतः विद्यानिष्ठ ब्राह्मणोंने जिस यज्ञका सम्पादन किया था, उस यज्ञको विधिवत् सम्पन्न करनेके पश्चात् एक मासके भीतर ही पाण्डवोंको महान् कष्ट प्राप्त हुआ तथा कठोर वनवास भोगना पड़ा॥ १०—१२॥ | | पीडनञ्चैव पाञ्चाल्यास्तथा द्यूते पराजयः।<br>वनवासो महत्कष्टं क्व गतं मखजं फलम्॥ १३ | द्रौपदीका अपमान हुआ, युधिष्ठिरकी जुएमें पराजय हुई, पाण्डवोंको वनवास हुआ और उन्हें तरह-तरहका घोर कष्ट मिला, तब यज्ञसे होनेवाला फल कहाँ चला गया?॥ १३॥ | | दासत्वञ्च विराटस्य कृतं सर्वैर्महात्मभिः।<br>कीचकेन परिक्लिष्टा द्रौपदी च प्रमद्वरा॥ १४<br><br>आशीर्वादा द्विजातीनां क्व गताः शुद्धचेतसाम्।<br>भक्तिर्वा वासुदेवस्य क्व गता तत्र सङ्कटे॥ १५ | महामनस्वी पाण्डवोंको राजा विराटकी दासता करनी पड़ी और नारियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदीको कीचकने प्रताड़ित किया। उस संकटकालमें विशुद्ध हृदयवाले ब्राह्मणोंके आशीर्वाद कहाँ चले गये थे और कृष्णकी भक्ति कहाँ चली गयी थी?॥ १४-१५॥ | | न रक्षिता तदा बाला केनापि द्रुपदात्मजा।<br>प्राप्तकेशग्रहा काले साध्वी च वरवर्णिनी॥ १६ | जिस समय परम सुन्दरी पतिव्रता द्रौपदीको बाल पकड़कर घसीटा जा रहा था, उस समय उस बेचारीकी रक्षा किसीने भी नहीं की॥ १६॥ | | किमत्र चिन्तनीयं वै धर्मवैगुण्यकारणम्।<br>केशवे सति देवेशे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे॥ १७ | जिस यज्ञमें देवाधीश भगवान् श्रीकृष्ण रहे हों और जिस यज्ञके कर्ता धर्मराज युधिष्ठिर हों, उस यज्ञका विपरीत फल मिलनेका कारण अवश्य ही धर्मानुष्ठानमें कोई कमी रही होगी—ऐसा समझना चाहिये॥ १७॥ | | भवितव्यमिति प्रोक्ते निष्फलः स्यात्तदागमः।<br>वेदमन्त्रास्तथान्ये च वितथाः स्युरसंशयम्॥ १८<br><br>साधनं निष्फलं सर्वमुपायश्च निरर्थकः।<br>भवितव्यं भवत्येव वचने प्रतिपादके॥ १९<br><br>आगमोऽप्यर्थवादः स्यात्क्रियाः सर्वा निरर्थकाः।<br>स्वर्गार्थञ्च तपो व्यर्थं वर्णधर्मश्च वै तथा॥ २०<br><br>सर्वं प्रमाणं व्यर्थं स्याद्भवितव्ये कृते हृदि।<br>उभयञ्चापि मन्तव्यं दैवं चोपाय एव च॥ २१ | यदि कहा जाय कि प्रारब्ध ही ऐसा था तो सभी शास्त्र निष्फल हो जायेंगे और वेद-मन्त्र तथा अन्य धर्मग्रन्थ निरर्थक सिद्ध होंगे; इसमें संशय नहीं है। प्रारब्ध तो अवश्यम्भावी है, इस कथनको यदि स्वीकार कर लिया जाय तो सभी साधन निष्फल और सभी उपाय व्यर्थ हो जायँगे; सभी वेद-शास्त्र अर्थवादके रूपमें परिणत हो जायँगे, सभी क्रियाएँ निरर्थक हो जायँगी और स्वर्ग-प्राप्तिके लिये तप तथा वर्ण-धर्म सब व्यर्थ हो जायँगे। केवल प्रारब्धको ही हृदयमें धारण करनेसे सभी प्रमाण व्यर्थ हो जायेंगे। अतएव भाग्य तथा उपाय दोनोंको मानना चाहिये॥ १८—२१॥ |