देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| अ० ३० ] | तृतीय स्कन्ध | ३९९ | | :--- | :--- | | कामधेनुपयः पात्रे कृत्वा मघवता स्वयम्।<br>पानार्थं प्रेषितं तस्याः पीतं चैवामृतं तथा॥ १६<br>सुरभीदुग्धपानात्सा क्षुत्तृड्दुःखविवर्जिता।<br>जाता कमलपत्राक्षी वर्तते वीक्षिता मया॥ १७ | स्वयं इन्द्रने एक पात्रमें कामधेनुका दूध सीताको पीनेके लिये भेजा था, उस अमृततुल्य दूधको उन्होंने पी लिया है। वे कामधेनुके दुग्धपानसे भूख-प्यासके दुःखसे रहित हो गयी हैं। मैंने उन कमलनयनीको स्वयं देखा है॥ १६-१७॥ | | उपायं कथयाम्यद्य तस्य नाशाय राघव।<br>व्रतं कुरुष्व श्रद्धावानाश्विने मासि साम्प्रतम्॥ १८ | हे राघवेन्द्र! मैं उस रावणके नाशका उपाय बताता हूँ। अब आप इसी आश्विनमासमें श्रद्धापूर्वक नवरात्रव्रत कीजिये॥ १८॥ | | नवरात्रोपवासञ्च भगवत्याः प्रपूजनम्।<br>सर्वसिद्धिकरं राम जपहोमविधानतः॥ १९<br>मेध्यैश्च पशुभिर्देव्या बलिं दत्त्वा विशंसितैः।<br>दशांशं हवनं कृत्वा सुशक्तस्त्वं भविष्यसि॥ २० | हे राम! नवरात्रमें उपवास तथा जप-होमके विधानसे किया गया भगवती-पूजन समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है। देवीको पवित्र बलि देकर तथा दशांश हवन करके आप पूर्ण शक्तिशाली बन जायँगे॥ १९-२०॥ | | विष्णुना चरितं पूर्वं महादेवेन ब्रह्मणा।<br>तथा मघवता चीर्णं स्वर्गमध्यस्थितेन वै॥ २१ | पूर्वकालमें भगवान् विष्णु, शिव, ब्रह्मा तथा स्वर्ग-लोकमें विराजमान इन्द्रने भी इसका अनुष्ठान किया था॥ २१॥ | | सुखिना राम कर्तव्यं नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>विशेषेण च कर्तव्यं पुंसा कष्टगतेन वै॥ २२ | हे राम! सुखी मनुष्यको इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये और कष्टमें पड़े हुए मनुष्यको तो यह व्रत विशेषरूपसे करना चाहिये॥ २२॥ | | विश्वामित्रेण काकुत्स्थ कृतमेतन्न संशयः।<br>भृगुणाथ वसिष्ठेन कश्यपेन तथैव च॥ २३<br>गुरुणा हृतदारेण कृतमेतन्महाव्रतम्।<br>तस्मात्त्वं कुरु राजेन्द्र रावणस्य वधाय च॥ २४<br>इन्द्रेण वृत्रनाशाय कृतं व्रतमनुत्तमम्।<br>त्रिपुरस्य विनाशाय शिवेनापि पुरा कृतम्॥ २५<br>हरिणा मधुनाशाय कृतं मेरौ महामते।<br>विधिवत्कुरु काकुत्स्थ व्रतमेतदतन्द्रितः॥ २६ | हे काकुत्स्थ! विश्वामित्र, भृगु, वसिष्ठ और कश्यप भी इस व्रतको कर चुके हैं; इसमें सन्देह नहीं है। इसी प्रकार हरण की गयी पत्नीवाले गुरु बृहस्पतिने भी इस व्रतको किया था। इसलिये हे राजेन्द्र! रावणके वध तथा सीताकी प्राप्तिके लिये आप इस व्रतको कीजिये। पूर्वकालमें इन्द्रने वृत्रासुरके वधके लिये तथा शिवने त्रिपुरदैत्यके वधके लिये यह सर्वश्रेष्ठ व्रत किया था। हे महामते! इसी प्रकार भगवान् विष्णुने भी मधुदैत्यके वधके लिये सुमेरुपर्वतपर यह व्रत किया था, अतः हे काकुत्स्थ! आप भी आलस्यरहित होकर विधिपूर्वक यह व्रत कीजिये॥ २३-२६॥ | | श्रीराम उवाच<br>का देवी किंप्रभावा सा कुतो जाता किमाह्वया।<br>व्रतं किं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २७ | श्रीराम बोले—हे दयानिधे! आप सर्वज्ञ हैं, अतः मुझे विधिपूर्वक बताइये कि वे कौन देवी हैं, उनका प्रभाव क्या है, वे कहाँसे उत्पन्न हुई हैं, उनका नाम क्या है तथा वह व्रत कौन-सा है?॥ २७॥ | | नारद उवाच<br>शृणु राम सदा नित्या शक्तिराद्या सनातनी।<br>सर्वकामप्रदा देवी पूजिता दुःखनाशिनी॥ २८ | नारदजी बोले—हे राम! सुनिये—वे देवी नित्य, सनातनी और आद्याशक्ति हैं, वे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर देती हैं और अपनी आराधनासे सभी प्रकारके कष्ट दूर कर देती हैं॥ २८॥ |