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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

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| ४३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ | | :--- | :--- |

| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा मुनिर्नारायणस्तदा ॥ ८<br><br>विमर्षमकरोच्चित्ते सुखोत्पादनसाधने ।<br>द्वितीयोऽयं महाशत्रुः क्रोधः सन्तापकारकः ॥ ९<br><br>कामादप्यधिको लोके लोभादपि च दारुणः ।<br>क्रोधाभिभूतः कुरुते हिंसां प्राणविघातिनीम् ॥ १०<br><br>दुःखदां सर्वभूतानां नरकारामदीर्घिकाम् ।<br>यथाग्निर्घर्षणाज्जातः पादपं प्रदहेत्तथा ॥ ११<br><br>देहोत्पन्नस्तथा क्रोधो देहं दहति दारुणः । | व्यासजी बोले—मुनि नारायणने ऐसा निश्चय करके अपने मनमें विचार किया कि सुख-प्राप्तिके समस्त साधनोंमें [अहंकारके बाद] यह क्रोध दूसरा प्रबल शत्रु है, जो अत्यन्त कष्ट प्रदान करता है। यह क्रोध संसारमें काम तथा लोभसे भी अधिक भयंकर है। क्रोधके वशीभूत प्राणी प्राणघातक हिंसातक कर डालता है, जो (हिंसा) सभी प्राणियोंके लिये दुःखदायिनी तथा नरकरूपी बगीचेकी बावलीके तुल्य है। जिस प्रकार वृक्षोंके परस्पर घर्षणसे उत्पन्न अग्नि वृक्षको ही जला डालती है, उसी प्रकार शरीरसे उत्पन्न भीषण क्रोध उसी शरीरको जला डालता है॥ ८–११ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्यमानं तं भ्रातरं दीनमानसम् ॥ १२<br><br>उवाच वचनं तथ्यं नरो धर्मसुतोऽनुजः । | व्यासजी बोले—इस प्रकार खिन्नमनस्क होकर चिन्तन करते हुए अपने भाई नारायणसे उनके लघु भ्राता धर्मपुत्र नरने यह तथ्यपूर्ण वचन कहा॥ १२ १/२॥ | | नर उवाच<br>नारायण महाभाग कोपं यच्छ महामते ॥ १३<br><br>शान्तं भावं समाश्रित्य नाशयाहङ्कृतिं पराम् ।<br>पुराहङ्कारदोषेण तपो नष्टं किलावयोः ॥ १४ | नर बोले—हे नारायण! हे महाभाग! हे महामते! आप क्रोधका त्याग कीजिये और शान्तभावका आश्रय लेकर इस प्रबल अहंकारका नाश कीजिये; क्योंकि पूर्व समयमें इसी अहंकारके दोषसे हम दोनोंका तप विनष्ट हो गया था॥ १३-१४॥ | | संग्रामश्चाभवत्ताभ्यां भावाभ्यामसुरेण ह ।<br>दिव्यवर्षसहस्रं तु प्रह्लादेन महाद्भुतम् ॥ १५<br><br>दुःखं बहुतरं प्राप्तं तत्रावाभ्यां सुरोत्तम ।<br>तस्मात्क्रोधं परित्यज्य शान्तो भव मुनीश्वर ॥ १६<br><br>(शान्तत्वं तपसो मूलं मुनिभिः परिकीर्तितम् ।) | अहंकार तथा क्रोध—इन्हीं दोनों भावोंके कारण हमलोगोंको असुरराज प्रह्लादके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त अद्भुत युद्ध करना पड़ा था। हे सुरश्रेष्ठ! उस युद्धमें हम दोनोंको महान् क्लेश मिला था। अतएव हे मुनीश्वर! आप क्रोधका परित्याग करके शान्त हो जाइये॥ १५-१६॥ (मुनियोंने शान्तिको तपस्याका मूल बतलाया है।) | | व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शान्तोऽभूद्धर्मनन्दनः । | व्यासजी बोले—उनकी यह बात सुनकर धर्मपुत्र नारायण शान्त हो गये॥ १६ १/२॥ | | जनमेजय उवाच<br>संशयोऽयं मुनिश्रेष्ठ प्रह्लादेन महात्मना ॥ १७<br><br>विष्णुभक्तेन शान्तेन कथं युद्धं कृतं पुरा ।<br>कृतवन्तौ कथं युद्धं नरनारायणावृषी ॥ १८ | जनमेजय बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह सन्देह उत्पन्न हो गया है कि शान्त स्वभाववाले विष्णुभक्त महात्मा प्रह्लादने पूर्वकालमें यह युद्ध क्यों किया और ऋषि नर-नारायणने भी संग्राम क्यों किया?॥ १७-१८॥ | | तापसौ धर्मपुत्रौ द्वौ सुशान्तमानसावुभौ ।<br>समागमः कथं जातस्तयोर्दैत्यसुतस्य च ॥ १९ | धर्मपुत्र नर-नारायण—ये दोनों ही अत्यन्त शान्त स्वभाववाले तपस्वी थे। ऐसी स्थितिमें दैत्यपुत्र प्रह्लाद तथा उन दोनों ऋषियोंका सम्पर्क कैसे हुआ?॥ १९॥ |