देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| ४६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| वचनं कस्य मन्तव्यमुपदेशधियानघ।<br>सर्वे लोभाभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा ॥ १४ | हे पुण्यात्मन् ! जब वे सब देवता और मुनिलोग भी लोभके वशीभूत हैं, तब उपदेश ग्रहण करनेके विचारसे किसका वचन प्रमाण माना जाय ? ॥ १४ ॥ | | व्यास उवाच<br>किं विष्णुः किं शिवो ब्रह्मा मघवा किं बृहस्पतिः।<br>देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा ॥ १५ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] चाहे विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बृहस्पति ही क्यों न हों—देहधारी तो विकारोंसे युक्त रहता ही है ॥ १५ ॥ | | रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि रागसंयुतः।<br>(रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिप)<br>रागवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते ॥ १६<br><br>सम्प्राप्ते संकटे सोऽपि गुणैः सम्बाध्यते किल।<br>कारणाद्रहितं कार्यं कथं भवितुमर्हति ॥ १७<br><br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां गुणा एव हि कारणम्।<br>पञ्चविंशत्समुद्भूता देहास्तेषां न चान्यथा ॥ १८<br><br>काले मरणधर्म्मोऽस्ते सन्देहः कोऽत्र ते नृप। | ब्रह्मा, विष्णु और महेशतक आसक्तिसे ग्रस्त हैं। (हे राजन्! आसक्त प्राणी कौन-सा अनर्थ नहीं कर बैठता) आसक्तिसे युक्त प्राणी भी चतुराईके कारण विरक्तकी भाँति दिखायी पड़ता है, किंतु संकट उपस्थित होनेपर वह [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे आबद्ध हो जाता है। कोई भी कार्य बिना कारणके कैसे हो सकता है? ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके भी मूल कारण गुण ही हैं। उनके भी शरीर पचीस तत्त्वोंसे बने हैं, इसमें सन्देह नहीं है। हे राजन्! समय आ जानेपर वे भी मृत्युको प्राप्त होते हैं, इसमें आपको संशय कैसा? ॥ १६—१८ ½ ॥ | | परोपदेशे विस्पष्टं शिष्टाः सर्वे भवन्ति च ॥ १९<br><br>विप्लुतिर्ह्यविशेषेण स्वकार्ये समुपस्थिते।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभद्रोहोहङ्कारमत्सराः ॥ २०<br><br>देहवान्कः परित्यक्तुमीशो भवति तान्युनः।<br>संसारोऽयं महाराज सदैवैवंविधः स्मृतः ॥ २१<br><br>नान्यथा प्रभवत्येव शुभाशुभमयः किल। | यह पूर्णरूपसे स्पष्ट है कि दूसरोंको उपदेश देनेमें सभी लोग शिष्ट बन जाते हैं, किंतु अपना कार्य पड़नेपर उस उपदेशका पूर्णतः लोप हो जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ, द्रोह, अहंकार और डाह आदि विकार हैं; उन्हें छोड़नेमें कौन-सा देहधारी प्राणी समर्थ हो सकता है? हे महाराज! यह संसार सदासे ही इसी प्रकार शुभाशुभसे युक्त कहा गया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १९—२१ ½ ॥ | | कदाचिद्भगवान्विष्णुस्तपश्चरति दारुणम् ॥ २२<br><br>कदाचिद्विविधान्यज्ञान्वितनोति सुराधिपः।<br>कदाचित्तु रमारङ्गरञ्जितः परमेश्वरः ॥ २३<br><br>रमते किल वैकुण्ठे तद्वशस्तरुणो विभुः।<br>कदाचिद्दानवैः सार्धं युद्धं परमदारुणम् ॥ २४<br><br>करोति करुणासिन्धुस्तद्बाणापीडितो भृशम्।<br>कदाचिज्जयमाप्नोति दैवात्सोऽपि पराजयम् ॥ २५<br><br>सुखदुःखाभिभूतोऽसौ भवत्येव न संशयः।<br>शेषे शेते कदाचिद्वै योगनिद्रासमावृतः ॥ २६<br><br>काले जागर्ति विश्वात्मा स्वभावप्रतिबोधितः। | कभी भगवान् विष्णु घोर तपस्या करते हैं, कभी वे ही सुरेश्वर अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं, कभी वे परमेश्वर विष्णु लक्ष्मीके प्रेम-रसमें सिक्त होकर उनके वशीभूत हो वैकुण्ठमें विहार करते हैं। वे करुणासागर विष्णु कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण युद्ध करते हैं और उनके बाणोंसे आहत हो जाते हैं। [उस युद्धमें] वे कभी विजयी होते हैं और कभी दैववश पराजित भी हो जाते हैं। इस प्रकार वे भी सुख तथा दुःखसे प्रभावित होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। वे विश्वात्मा कभी योगनिद्राके वशवर्ती होकर शेषशय्यापर शयन करते हैं और कभी सृष्टिकाल आनेपर योगमायासे प्रेरित होकर जाग भी जाते हैं॥ २२—२६ ½ ॥ |