देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 623 of 889
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६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
| संस्कृत | हिन्दी |
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| नाविकानां तु संयोगः स्मृतः स्वाभाविको बुधैः।<br>विविधावृतचित्तानां प्रसङ्गपरिवर्तिनाम्॥ १९<br><br>अत्यल्पसुखदातृत्वात्कनिष्ठोऽयं स्मृतो बुधैः।<br>अत्युत्तमस्तु संयोगः संसारे सुखदः सदा॥ २०<br><br>नारीपुरुषयोः कान्ते समानवयसोः सदा।<br>संयोगो यः समाख्यातः स एवात्युत्तमः स्मृतः॥ २१<br><br>अत्युत्तमसुखस्यैव दातृत्वात्स तथाविधः।<br>चातुर्यरूपवेषाद्यैः कुलशीलगुणैस्तथा॥ २२<br><br>परस्परसमुत्कर्षः कथ्यते हि परस्परम्।<br>तं चेत्करोषि संयोगं वीरेण च मया सह॥ २३<br><br>अत्युत्तमसुखस्यैव प्राप्तिः स्यात्ते न संशयः।<br>नानाविधानि रूपाणि करोमि स्वेच्छया प्रिये॥ २४<br><br>इन्द्रादयः सुराः सर्वे संग्रामे विजिता मया।<br>रत्नानि यानि दिव्यानि भवनेऽस्मिन्ममाधुना॥ २५<br><br>भुंक्ष्व त्वं तानि सर्वाणि यथेष्टं देहि वा यथा।<br>पट्टराज्ञी भवाद्य त्वं दासोऽस्मि तव सुन्दरि॥ २६<br><br>वैरं त्यजेऽहं देवैस्तु तव वाक्यान्न संशयः।<br>यथा त्वं सुखमाप्नोषि तथाहं करवाणि वै॥ २७<br><br>आज्ञापय विशालाक्षि तथाहं प्रकरोम्यथ।<br>चित्तं मे तव रूपेण मोहितं चारुभाषिणि॥ २८<br><br>आतुरोऽस्मि वरारोहे प्राप्तस्ते शरणं किल।<br>प्रपन्नं पाहि रम्भोरु कामबाणैः प्रपीडितम्॥ २९<br><br>धर्माणामुत्तमो धर्मः शरणागतरक्षणम्।<br>त्वदीयोऽस्म्यसितापाङ्गि सेवकोऽहं कृशोदरि॥ ३०<br><br>मरणान्तं वचः सत्यं नान्यथा प्रकरोम्यहम्।<br>पादौ नतोऽस्मि तन्वङ्गि त्यक्त्वा नानायुधानि ते॥ ३१ | विविध विचारोंसे युक्त चित्तवाले तथा प्रसंगवश एकत्रित नौकामें बैठे हुए लोगोंके मिलनेको विद्वानोंने स्वाभाविक संयोग कहा है। बहुत कम समयके लिये सुख प्रदान करनेके कारण विद्वानोंके द्वारा इसे कनिष्ठ संयोग कहा गया है॥ १९ ½॥<br><br>अत्युत्तम संयोग संसारमें सदा सुखदायक होता है। हे कान्ते! समान अवस्थावाले स्त्री-पुरुषका जो संयोग है, वही अत्युत्तम कहा गया है। अत्युत्तम सुख प्रदान करनेके कारण ही उसे उस प्रकारका संयोग कहा गया है। चातुर्य, रूप, वेष, कुल, शील, गुण आदिमें समानता रहनेपर परस्पर सुखकी अभिवृद्धि कही जाती है॥ २०—२२ ½॥<br><br>यदि तुम मुझ वीरके साथ संयोग करोगी तो तुम्हें अत्युत्तम सुखकी प्राप्ति होगी; इसमें सन्देह नहीं है। हे प्रिये! मैं अपनी रुचिके अनुसार अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेता हूँ। मैंने इन्द्र आदि सभी देवताओंको संग्राममें जीत लिया है। मेरे भवनमें इस समय जो भी दिव्य रत्न हैं, उन सबका तुम उपभोग करो; अथवा इच्छानुसार उसका दान करो। अब तुम मेरी पटरानी बन जाओ। हे सुन्दरि! मैं तुम्हारा दास हूँ॥ २३—२६॥<br><br>तुम्हारे कहनेसे मैं देवताओंसे वैर करना भी छोड़ दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है। तुम्हें जैसे भी सुख मिलेगा, मैं वही करूँगा। हे विशालनयने! अब तुम मुझे आज्ञा दो और मैं उसका पालन करूँ। हे मधुरभाषिणि! मेरा मन तुम्हारे रूपपर मोहित हो गया है॥ २७-२८॥<br><br>हे सुन्दरि! मैं [तुम्हें पानेके लिये] व्याकुल हूँ, इसलिये इस समय तुम्हारी शरणमें आया हूँ। हे रम्भोरु! कामबाणसे आहत मुझ शरणागतकी रक्षा करो। शरणमें आये हुएकी रक्षा करना सभी धर्मोंमें उत्तम धर्म है। श्याम नेत्रोंवाली हे कृशोदरि! मैं तुम्हारा सेवक हूँ। मैं मरणपर्यन्त सत्य वचनका पालन करूँगा, इसके विपरीत नहीं करूँगा। हे तन्वंगि! नानाविध आयुधोंको त्यागकर मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत हूँ॥ २९—३१॥ |