देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
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| ६२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इत्युक्त्वा चषकं हैमं गृहीत्वा सुरया युतम्।<br>पपौ पुनः पुनः क्रोधाद्धन्तुकामा महासुरम्॥ ५४ | ऐसा कहकर क्रोधपूर्वक उस दैत्यको मार डालनेके विचारसे भगवती मद्यपूर्ण सोनेका पात्र लेकर बारम्बार उसे पीने लगीं॥ ५४॥ |
| पीत्वा द्राक्षासवं मिष्टं शूलमादाय सत्वरा।<br>दुद्राव दानवं देवी हर्षयन्देवतागणान्॥ ५५ | उस मीठे द्राक्षारसको पीकर भगवती बड़े वेगसे अपना त्रिशूल उठाकर देवताओंको हर्षित करती हुई उस दानवपर झपटीं॥ ५५॥ |
| देवास्तां तुष्टुवुः प्रेम्णा चक्रुः कुसुमवर्षणम्।<br>जय जीवेति ते प्रोचुर्दुन्दुभीनाञ्च निःस्वनैः॥ ५६ | उस समय देवता प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे और पुष्पवर्षा करने लगे। वे दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ देवीकी जय हो—ऐसा बार-बार कहने लगे॥ ५६॥ |
| ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः पिशाचोरगचारणाः।<br>किन्नराः प्रेक्ष्य संग्रामं मुदिता गगने स्थिताः॥ ५७ | सभी ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, पिशाच, नाग, चारण और किन्नरगण आकाशमण्डलमें स्थित होकर उस युद्धको देखकर आनन्दित हो रहे थे॥ ५७॥ |
| सोऽपि नानाविधान्देहान्कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः।<br>मायामयाञ्जघानाजौ देवीं कपटपण्डितः॥ ५८ | कपटकार्यमें प्रवीण वह महिषासुर रणभूमिमें बार-बार विविध प्रकारके मायामय शरीर धारण करके भगवतीपर प्रहार करने लगा॥ ५८॥ |
| चण्डिकापि च तं पापं त्रिशूलेन बलाद्हृदि।<br>ताडयामास तीक्ष्णेन क्रोधादारुणलोचना॥ ५९ | तब क्रोधसे लाल नेत्र करके चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण त्रिशूलसे उस पापीके हृदयदेशपर बलपूर्वक आघात किया॥ ५९॥ |
| ताडितोऽसौ पपातोर्व्यां मूर्च्छामान मुहूर्तकम्।<br>पुनरुत्थाय चामुण्डां पद्भ्यां वेगादताडयत्॥ ६०<br><br>विनिहत्य पदाघातैर्जहास च मुहुर्मुहुः।<br>रुराव दारुणं शब्दं देवानां भयकारकम्॥ ६१ | उससे आहत होकर महिषासुर भूमिपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया, किंतु मुहूर्तभर बाद पुनः उठकर अपने पैरोंसे वेगपूर्वक देवी चामुण्डाको मारने लगा। इस प्रकार पदप्रहारोंसे देवीको चोट पहुँचाकर वह बारम्बार हँसने लगा और देवताओंको भयभीत कर देनेवाली भीषण ध्वनि करके चिल्लाने लगा॥ ६०-६१॥ |
| ततो देवी सहस्रारं सुनाभं चक्रमत्तमम्।<br>करे कृत्वा जगादोच्चैः संस्थितं महिषासुरम्॥ ६२<br><br>पश्य चक्रं मदान्धाद्य तव कण्ठनिकृन्तनम्।<br>क्षणमात्रं स्थिरो भूत्वा यमलोकं व्रजाधुना॥ ६३ | तदनन्तर भगवतीने हजार अरों और सुन्दर नाभिवाला एक उत्कृष्ट चक्र हाथमें लेकर अपने समक्ष खड़े महिषासुरसे उच्च स्वरमें कहा—अरे मदान्ध! तुम्हारे गलेको काट डालनेवाले इस चक्रकी ओर देखो। तनिक देर और ठहरकर अब तुम यमलोकके लिये प्रस्थान कर दो॥ ६२-६३॥ |
| इत्युक्त्वा दारुणं चक्रं मुमोच जगदम्बिका।<br>शिरश्छिन्नं रथाङ्गेन दानवस्य तदा रणे॥ ६४<br><br>सस्राव रुधिरं चोष्णं कण्ठनालाद् गिरेर्यथा।<br>गैरिकाद्यरुणं प्रौढं प्रवाहभिव नैर्झरम्॥ ६५ | ऐसा कहकर जगदम्बाने युद्धभूमिमें उस दारुण चक्रको चला दिया। तब चक्रसे उस दानवका सिर कट गया। उस समय उसके कण्ठकी नलीसे इस प्रकार उष्ण रक्त बहने लगा, जैसे गेरू आदिसे युक्त लाल पानीका झरना बड़े वेगके साथ पर्वतसे गिर रहा हो। [मस्तक कट जानेपर] उस दानवका |