देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 641 of 889
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| ६३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| शप्तो हरिस्तु भृगुणा कुपितेन कामं<br>मीनो बभूव कमठः खलु सूकरस्तु।<br>पश्चान्नृसिंह इति यश्छलकृद्धरायां<br>तान्सेवतां जननि मृत्युभयं न किं स्यात्॥ १८ | हे जननि! महर्षि भृगुने कुपित होकर भगवान् विष्णुको शाप दे दिया, जिससे उन्हें पृथ्वीपर बारम्बार मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और छली वामनका अवतार लेना पड़ा। तो फिर [एक ऋषिके शापसे अपनी रक्षा न कर पानेवाले ऐसे विष्णु आदि] उन देवताओंकी उपासना करनेवाले लोगोंको मृत्युका भय क्यों नहीं बना रहेगा?॥ १८॥ |
| शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धं<br>शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य।<br>तं ये नरा भुवि भजन्ति कपालिनं तु<br>तेषां सुखं कथमहापि परत्र मातः॥ १९ | हे माता! सम्पूर्ण संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि भृगुमुनिके काननमें गये हुए भगवान् शिवका लिंग मुनिके शापके कारण कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा था। अतः जो मनुष्य पृथ्वीपर उन कापालिक शिवको ही भजते हैं, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें भी सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?॥ १९॥ |
| योऽभूद् गजाननगणाधिपतिर्महेशा-<br>त्तं ये भजन्ति मनुजा वितथप्रपन्नाः।<br>जानन्ति ते न सकलार्थफलप्रदात्रीं<br>त्वां देवि विश्वजननीं सुखसेवनीयाम्॥ २० | शिवसे जो गणोंके अधिपति गणेश उत्पन्न हुए हैं—उन गणेशको जो लोग भजते हैं, उनकी यह शरणागति व्यर्थ है। हे देवि! वे लोग सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली तथा सुखपूर्वक आराधनीय आप जगज्जननीको नहीं जानते हैं॥ २०॥ |
| चित्रं त्वयारिजनतापि दयार्द्रभावा-<br>द्धत्वा रणे शितशरैर्गमिता द्युलोकम्।<br>नोचेत्स्वकर्मनिचिते निरये नितान्तं<br>दुःखातिदुःखगतिमापदमापतेत्सा ॥ २१ | यह बड़ी विचित्र बात है कि आपने अपने शत्रु-दैत्योंपर भी दया करके उन्हें तीक्ष्ण बाणोंसे रणमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया। यदि आप ऐसा न करतीं तो वे अपने कर्मोंके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाले घोर नरकमें बड़े-से-बड़े दुःख और विपत्तिमें पड़ जाते॥ २१॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिरप्युत गर्वभावा-<br>ज्जानन्ति तेऽपि विबुधा न तव प्रभावम्।<br>केऽन्ये भवन्ति मनुजा विदितुं समर्थाः<br>सम्मोहितास्तव गुणैरमितप्रभावैः॥ २२ | जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी अहंकारके कारण आपकी महिमा नहीं जानते, तब आपके अमित प्रभाववाले गुणोंसे मोहित तुच्छ मनुष्य आपकी महिमाको कैसे जान सकेंगे?॥ २२॥ |
| क्लिश्यन्ति तेऽपि मुनयस्तव दुर्विभाव्यं<br>पादाम्बुजं न हि भजन्ति विमूढचित्ताः।<br>सूर्याग्निसेवनपराः परमार्थतत्त्वं<br>ज्ञातं न तैः श्रुतिशतैरपि वेदसारम्॥ २३ | जो मुनिगण आपके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे ध्यानमें आनेवाला समझकर आपके चरणकमलकी उपासना नहीं करते; अपितु सूर्य, अग्नि आदिकी उपासनामें लगे रहते हैं, वे मूढ़बुद्धि अनेकविध कष्ट पाते हैं। समस्त श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित वेदसारस्वरूप परमार्थतत्त्वको वे नहीं जान पाते॥ २३॥ |
* इस पुराणमें जगदम्बा पराशक्तिकी विशिष्टता प्रदर्शित करनेके लिये ही अन्य देवोंकी उपासनासे विरत रहनेकी बात कही गयी है। वैसे तो भगवती एवं ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि देवगण भी परमात्मप्रभुके ही स्वरूप हैं; उनमें कोई भेद नहीं है।