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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages

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१२ ] धम्मपदं [ १५/७ वह पुरुष ) जय ओर पराजयको छोड़ सुखकी (नींद) सोता है। जेतवन कोई कुलकन्या २०२—नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि । नत्थि खन्धसमा दुक्खा नत्थि सन्तिपरं सुखं ॥६॥ ( नास्ति रागसमोऽग्निः, नास्ति द्वेषसमः कलिः । नास्ति स्कन्धसमा दुःखाः, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६॥ ) अनुवाद—रागके समान अग्नि नहीं, द्वेषके समान मल नहीं, (पाँच) स्कन्धो* के (=समुदाय) समान दुःख नहीं, शान्तिसे बढ़कर सुख नहीं। आलवी एक उपासक २०३—जिघच्छा परमा रोगा, सङ्घारा परमा दुखा । एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बाणं परमं सुखं ॥७॥ ( जिघत्सा परमो रोगः, संस्काराः परमं दुःखम् । एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७॥ ) अनुवाद—भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं,

  • रूप, वेदना, सञ्ञा, सस्कार, विञ्ञान यह पाँच स्कन्ध हैं। वेदना, सञ्ञा, सस्कार विञ्ञानके अन्दर हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कध है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विञ्ञान स्कध है। रूप (=Matter) और विञ्ञान (=Mind) इन्हींके मेळसे सारा ससार बना है।