धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context९४ ] धम्मपदं [ १५।१२ ( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः । अदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०) २०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति । दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा । धीरो च सुखसंवासो ञातीनं 'व समागमो ॥११॥ ( बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति । दुःखो बालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा । धीरश्च सुखसंवासो ज्ञातीनामिव समागमः ॥११॥) अनुवाद—आर्यों* (=सत्पुरुषों) का दर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ निवास सदा सुखदायक होता है; मूढ़ोंके न दर्शन होनेसे (मनुष्य) सदा सुखी रहता है। मूढ़ोंकी संगतिमें रहने- वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, मूढ़ोंका सहवास शत्रु की तरह सदा दुःखदायक होता है, बन्धुओंके समागम- की भाँति धीरोंका सहवास सुखद होता है। वेलुवगाम सक्क (देवराज) २०८-तस्मा हि धीरं च पञ्ञञ्च बहुस्सुतं च धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं । तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं भजेथ नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥१२॥ *निर्वाणके पथपर अविचल रूपसे आरूढ़ स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी तथा निर्वाण-प्राप्त=अर्हत् इन चार प्रकारके पुरुषोंको आर्य कहते हैं।