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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages

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११४ ] धम्मपद [ १८।२१ ( परवद्याऽनुदर्शिनो नित्यं उज्झ्यानसंज्ञिनः । आस्रवास्तस्य बर्द्धन्ते आराद् स आस्रवक्षयात् ॥१९॥ ) अनुवाद—दूसरेके दोषोकी खोजमें रहनेवाले, सदा हाय हाय करने वाले ( पुरुष )के आस्रव ( =चित्तमल ) बढ़ते हैं, वह आस्रवोंके विनाशसे दूर हटा हुआ है। कुशीनगर सुभद्र (परिव्राजक) २५४-आकासे च पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे । पपञ्चाभिरता पजा निप्पपञ्चा तथागता ॥२०॥ ( आकाशे च पदं नाऽस्ति श्रमणो नाऽस्ति बहिः । प्रपंचाऽभिरताः प्रजा निष्प्रपंचास्तथागताः ॥२०॥ ) २५५-आकासे च पदं नत्थि समणो नत्थि बाहिरे । सङ्खारा सस्सता नत्थि, नत्थि बुद्धानमिञ्जितं ॥ २१॥ ( आकाशे च पदं नाऽस्ति श्रमणो नाऽस्ति बहिः । संस्काराः शाश्वता न सन्ति, नाऽस्ति बुद्धानामिङ्गितम् ॥२१॥) अनुवाद—आकाशमें पद (-चिन्ह) नहीं, बाहरमें श्रमण (=संन्यासी) नहीं रहता, लोग प्रपंचमें लगे रहते हैं, (किन्तु) तथा- गत (=बुद्ध) प्रपंचरहित होते हैं। १८-मलवर्ग समाप्त