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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages

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२४।१८ ] तण्हावग्गो [ १५५ अनुवाद—जो प्राणी सन्देहसे मथित, तीव्र रागसे युक्त, सुन्दर ही सुन्दरको देखने वाला है, उसकी तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है, वह (अपनेलिए) और भी दृढ़ बन्धन तय्यार करता है। ३५०-वितक्कूपसमे च यो रतो असुभं भावयति सदा सतो । एस खो व्यन्तिकाद्दिनी एसच्छेज्जति मारबन्धनं ॥१७॥ ( वितर्कौपशमे च यो रतो ऽशुभंभावयते सदा स्मृतः। एष खलु व्यन्तीकरिष्यति एष छेत्स्यति मारबन्धनम् ॥१७॥) अनुवाद—सन्देहके शान्त करनेमें जो रत है, सचेत रह (जो) अशुभ (दुनियाके अन्धेरे पहलू) की भी सदा भावना करता है। वह मारके बन्धनको छिन्न करेगा, विनाश करेगा। जेतवन मार ३५१-निट्ठङ्गतो असन्तासी वीततण्हो अनङ्गणो। उच्छिन्दि भवसल्लानि अन्तिमोऽयं समुस्सयो ॥१८॥ (निष्ठांगतोऽसंत्रासी वीततृष्णोऽनंगणः। उत्सृज्य भवशल्यानि, अन्तिमोऽयं समुच्छ्रयः ॥१८॥) अनुवाद—जिसके (पाप-पुण्य) समाप्त हो गये; जो त्रास-उत्पादक नहीं है, जो तृणारहित और मलरहित है, वह भवके शल्योको उखाडेगा, यह उसका अंतिम देह है।