धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context२६।४ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७१ अनुवाद—जब ब्राह्मण दो धर्मों (—चित्त-संयम और भावना) में पारंगत हो जाता है, तब उस जानकारके सभी संयोग (=बंधन ) अस्त हो जाते हैं । जेतवन मार ३८५-यस्स पारं अपारं वा पारापारं न विज्जति । वीतद्दरं विसञ्जुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणम् ॥३॥ ( यस्य पारं अपारं वा पारापारं न विद्यते । वीतदरं विसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३॥ ) अनुवाद—जिसके पार (=आँख, कान, नाक, जीभ, काया, मन ), अपार (=रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श, धर्म ) और पारापार (=मैं और मेरा ) नहीं हैं, ( जो ) निर्भय और अनासक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( कोई ब्राह्मण ) ३८६-झायिं विरजमासीनं कतकिच्चं अनासवं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥४॥ ( ध्यायिनं विरजसमासीनं कृतकृत्यं अनास्रवम् । उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४॥ ) अनुवाद—( जो ) ध्यानी, निर्मल, आसनबद्ध (=स्थिर ), कृतकृत्य आस्रव (=चित्तमल)-रहित है, जिसने उत्तम अर्थ (=सत्य) को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।