धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context२६।८ ब्राह्मणवग्गो [ १७३ जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३८६-न ब्राह्मणस्स पहरेय्य नास्स मुंचेय ब्राह्मणो । धि ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो धि यस्स मुञ्चति ॥७॥ (न ब्राह्मणं प्रहरेत् नाऽस्मै मुञ्चेद् ब्राह्मणः । धिग् ब्राह्मणस्य हन्तारं ततो धिग् यस्मै मुंचति ॥७॥ ) अनुवाद—ब्राह्मण (=निष्पाप) पर प्रहार नहीं करना चाहिये, और ब्राह्मणको भी उस (प्रहारदाता) पर (कोप) नहीं करना चाहिये, ब्राह्मणको जो मारता है, उसे धिक्कार है, और धिक्कार उसको भी है, जो (उसके लिये) कोप करता है। ३६०-न ब्राह्मणस्सेतदकिञ्चि सेय्यो यदा निषेधो मनसो पियेहि । यतो यतो हिंसमनो निवत्तति ततो ततो सम्मति एव दुक्खं ॥८॥ (न ब्राह्मणस्यैतद् अकिञ्चित् श्रेयो यदा निषेधो मनसा प्रियेभ्यः । यतो यतो हिंस्रमनो निवर्तते ततस्ततः शाम्यत्येव दुःखम् ॥८॥ ) अनुवाद—ब्राह्मणके लिये यह बात कम कल्याण(कारी) नहीं है, जो वह प्रिय (पदार्थों) से मनको हटा लेता है, जहाँ जहाँ मन हिंसासे मुड़ता है, वहाँ वहाँ दुःख (अवश्य) ही शान्त हो जाता है।