धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context२६।१३ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७५ अनुवाद—न जटासे, न गोत्रसे; न जन्मसे ब्राह्मण होता है, जिसमें सच्य और धर्म हैं, वही, शुचि (=पवित्र ) है, और वही ब्राह्मण है । वैशाली ( कूटागारशाला ) ( पाखण्डी ब्राह्मण ) ३६४-किं ते जटाहि दुम्मेध ! किं ते अजिनसाटिया । अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१२॥ (किं ते जटाभिः दुर्भेध ! किं तेऽजिनशाट्या । आभ्यन्तरं ते गहनं बाहिः परिमार्जयसि ? ॥१२॥) अनुवाद—हे दुर्बुद्धि ! जटाओसे तेरा क्या (बनेगा), (और) मृग- चर्मके पहिननेसे तेरा क्या ? भीतर (दिल) तो तेरा (राग आदि मलोंसे) परिपूर्ण है, बाहर क्या धोता है ? राजगृह ( गृध्रकूट ) किसा गोतमी ३६५-पंसुकूलधरं जन्तुं किसं धमनिसन्थतं । एकं वनस्मिं झायन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१३॥ (पांशुकूलधरं जन्तुं कृशं धमनिसन्ततम् । एकं वने ध्यायन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१३॥) अनुवाद—जो प्राणी फटे चीथड़ोको धारण करता है, जो दुबला पतला और नसोंसे मढ़े शरीरवाला है, जो अकेला वनमें ध्यानरत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।