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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages

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१०।१६ ] दण्डवग्गो [ ६५ सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खू ॥१४॥ ( अलंकृतश्चेदपि शमं चरेत् शान्तो दान्तो नियतो ब्रह्मचारी । सर्वेषु भूतेषु निधाय दण्डं स ब्राह्मणः स श्रमणः स भिक्षुः ॥१४॥ ) अनुवाद—अलंकृत रहते भी यदि वह शान्त, दान्त, नियमतत्पर, ब्रह्म- चारी, सारे प्राणियोंके प्रति दंडत्यागी है, तो वही ब्राह्मण है, वही श्रमण (=संन्यासी ) वही भिक्षु है । जेतवन पिलोतिक ( थेर ) १४३—हिरिनिसेधो पुरिसो कोचि लोकस्मिं विज्जति । यो निन्दं अप्पबोधति अस्सो भद्दो कशामिव ॥१५॥ ( ह्रीनिषेधः पुरुषः कश्चित् लोके विद्यते । यो निन्दां न प्रबुध्यति अश्वो भद्रः कशामिव ॥१५॥) अनुवाद—लोकमें कोई पुरुष होते हैं, जो ( अपने ही ) लज्जा करके निषिद्ध ( कर्म ) को नहीं करते, जैसे उत्तम घोड़ा कोड़े को नहीं सह सकता, वैसे ही वह निन्दाको नहीं सह सकते । १४४—अस्सो यथा भद्रो कसानिविट्ठो आतापिनो संवेगिनो भवाथ । सद्धाय सीलेन च वीरियेन-च समाधिना धम्मविनिच्छयेन च । ५