धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context६८ ] धम्मपदं [ ११।५ अनुवाद—देखो विचित्र शरीरको, जो व्रणोंसे युक्त, फूला, पीड़ित नाना सङ्कल्पोंसे युक्त है, जिसकी स्थिति अनियत है। जेतवन उत्तरा (थेरी) १४८-परिजिन्नमिदं रूपं रोगनिड्ढं पभङ्गुरं । भिज्जती पूतिसन्देहो मरणन्तं हि जीवितं ॥३॥ (परिजीर्णमिदं रूपं रोगनीडं प्रभंगुरम्। भिद्यते पूतिसन्देहो मरणान्तं हि जीवितम् ॥३॥) अनुवाद—यह रूप जीर्ण शीर्ण, रोगका घर, और भंगुर है, सड़ कर देह भग्न होती है; जीवन मरणान्त जो ठहरा । जेतवन अधिमान (भिक्खु) १४६-यानि'मानि अपत्यानि अलाबूनेव सारदे । कापोतकानि अट्ठीनि तानि दिस्वान का रति ॥४॥ (यानीमान्यपथ्यान्यलावूनीव शरदि। कापोतकान्यस्थीनि तानि दृष्ट्वा का रतिः ॥४॥) अनुवाद—शरद् कालकी अपथ्य लौकीकी भाँति (फेंक दी गईं), या कबूतरोंकी सी (सफेद होगईं) हड्डियोंको देखकर किस- को इस (शरीरमें) प्रेम होगा ? जेतवन रूपनन्दा (थेरी) १५०-अट्ठीनं नगरं कतं मंसलोहितलेपनं । यत्थ जरा च मच्चू च मानो मक्खो च ओहितो ॥५॥