धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context१४।४ ] बुद्धवग्गो [ ८३ अनुवाद—जिसका जीता वेजीता नहीं किया जा सकता, जिसके जीते ( राग, द्वेष, मोह फिर ) नहीं लौटते; उस अपद (=स्थान- रहित ), अनन्तगोचर (=अनन्तको देखनेवाले ) बुद्धको किस पथसे प्राप्त करोगे ? जिसकी जाल फैलानेवाली विष- रूपी तृष्णा कहीं भी लेजाने लायक नहीं रही; उस अपद् ०। संकाश्य नगर देव, मनुष्य १८१—ये झाणपसुता धीरा नेक्खम्मूपसमे रता । देवापि तेसं पिहयन्ति सम्बुद्धानं सतीमतं ॥३॥ ( ये ध्यानप्रसिता धीरा नैष्कर्म्योपशमे रताः। देवा अपि तेषां स्पृहयन्ति संबुद्धानां स्मृतिमत्ताम् ॥३॥ ) अनुवाद—जो धीर ध्यानमें लग्न, निष्कर्मता और उपशममें रत हैं, उन स्मृतिमान् (=सचेत ) बुद्धोंकी देवता भी स्पृहा (=होड ) करते हैं । वाराणसी ऐरकपत्त ( नागराज ) १८२-किच्छो मनुस्सपटिलाभो किच्छं मच्चानं जीवितं । किच्छं सद्धम्मसवणं किच्छो बुद्धानं उप्पादो ॥४॥ ( कृच्छ्रो मनुष्यप्रतिलाभः कृच्छ्रं मर्त्यानां जीवितम्। कृच्छ्रं सद्धर्मश्रवणं कृच्छ्रो बुद्धानां उत्पादः ॥४॥ ) अनुवाद—मनुष्य( योनि ) का लाभ कठिन है, मनुष्यका जीवन ( मिलना ) कठिन है, सच्चा धर्म सुननेको मिलना कठिन है, बुद्धों (=परम ज्ञानियों ) का जन्म कठिन है ।