श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 212 of 656
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२१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कीजिये और हमसे बताइये कि शोक करनेका क्या कारण है ? आपको [इस प्रकार] शोकग्रस्त देखकर हमें भी तीव्र शोक हो रहा है ॥ १५-१६ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन!] मन्त्रियोंकी बात सुनकर कृतवीर्यने उनसे कहा कि मैंने स्वप्नमें पिताजीको देखा, इसीलिये मेरा मन विह्वल है ॥ १७ ॥ संकटचतुर्थीव्रतका बोध करानेवाली पुस्तक मेरे हाथमें देकर वे उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥ उनके वियोगमें मैं वैसे ही शोकाकुल हूँ, जैसे हाथमें आये हुए धनके चले जानेपर निर्धन व्यक्ति शोकाकुल होता है। उन्होंने मुझसे यह वचन कहा कि पुत्रकी कामनासे तुम यह व्रत करो ॥ १९ ॥ हे मन्त्रिगण ! जब मैं प्रबुद्ध हुआ (जगा), तब मैंने [अपने] हाथमें पुस्तक देखी। उसी समयसे मैं आश्चर्य, हर्ष और शोकसे आँसू बहा रहा हूँ, इसके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है ॥ २० ॥ मन्त्री बोले—[हे राजन्!] जो मनुष्य, सर्प और राक्षसोंसहित समस्त लोकोंके पिता हैं, उन्हीं गजानन गणेशजीने पितृरूपमें तुमसे सन्तानप्राप्तिका उपाय कहा है; अन्यथा हे नृपश्रेष्ठ ! स्वप्नकालिक उपलब्धि वास्तविक कैसे होती और स्वप्नमें देखी हुई पुस्तक प्रत्यक्ष कैसे उपस्थित हो जाती ! बिना उनकी कृपाके स्वप्न भी विपरीत फल ही देनेवाले होते हैं ॥ २१-२२१/२ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन !] मन्त्रियोंके इस प्रकारके वचन सुनकर सावधानचित्त होकर राजाने पण्डितों और सुहृज्जनोंको बुलाकर उनसे पूछा कि हे द्विजगण ! गणेशजीकी कृपासे प्राप्त इस पुस्तकका अर्थ बतलाइये। तब उन सबने उस पुस्तकको देखकर सम्पूर्ण सभाको उसका अर्थ बतलाया ॥ २३-२४१/२ ॥ द्विज बोले—हे राजन् ! इसमें आप कृतवीर्यके पिता और ब्रह्माजीका महान् संवाद वर्णित है ॥ २५ ॥ इसमें सम्पूर्ण संकटोंका नाश करनेवाले [गणेश] चतुर्थीव्रतका निरूपण हुआ है। चन्द्रमाके उदय होनेपर की जानेवाली गणेशजीकी पूजा इसमें विस्तारपूर्वक कही गयी है ॥ २६ ॥ इसमें अंगारकचतुर्थीकी महिमाका बार-बार वर्णन हुआ है तथा चतुर्थी तिथि, भगवान् गणेश और चन्द्रमाको दिये जानेवाले अर्घ्यका मन्त्रसहित वर्णन है। इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराने, उनका पूजन करने और उन्हें अनेक प्रकारके दान देनेका इसमें निरूपण है ॥ २७-२८ ॥ गणेशजीको दूर्वा समर्पण करनेके फलका तथा श्वेत दूर्वा समर्पित करनेके फलका इसमें पृथक् रूपसे वर्णन है। हे निष्पाप महाभाग ! यह व्रत बड़े ही भाग्यसे आपको प्राप्त हुआ है ॥ २९ ॥ इससे पहले संसारमें इस व्रतको करते न तो किसीको देखा गया था, न ही इसके विषयमें सुना गया था। यह भविष्यमें लोगोंके लिये उपकारी होगा। इसके [माहात्म्यके] श्रवण और स्मरणसे भी मनुष्योंके संकटोंका हरण होगा ॥ ३० ॥ इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन!] पण्डितोंके मुखसे [संकटचतुर्थीविषयक] वह वर्णन सुनकर राजा कृतवीर्य और अन्य सभी लोग आश्चर्यमिश्रित हर्षसे भर गये। तदनन्तर राजाने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन किया तथा उन्हें बहुत-से वस्त्र, अलंकरण, रत्न और धन- धान्य प्रदान किये। तत्पश्चात् राजा कृतवीर्यने अपने कुलगुरु अत्रिको बुलाकर उनका तथा भगवान् विनायक गणेशजीका यथाविधि पूजनकर शुभ मुहूर्तमें [गणेशजीके] शुभ फलदाता एकाक्षर मन्त्रको ग्रहण किया ॥ ३१-३३ ॥ तदनन्तर राजाने जितेन्द्रियतापूर्वक गणेशजीका ध्यान करते हुए अनन्य भक्तिसे उनके मन्त्रका जप किया और गणाधिपति गणेशजीकी प्रसन्नता एवं पुत्र-प्राप्तिके लिये उस संकटनाशनव्रतको सम्पन्न किया ॥ ३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'व्रतनिरूपण' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥