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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

Page 316 of 656

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Page 316

३१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

इसमें भी आपको अनिष्ट प्रतीत हो रहा है। विधाताके द्वारा रची घटनाका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता और न उससे कुछ अन्यथा ही कर सकता है ॥ ३१ ॥ हे राजन्! उस बालकको आप मुझे दिखलायें, मैं उसके लक्षण बताऊँगा। तब राजाने सभी बालकोंको बुलवाया। सबसे पहले विनायक पहुँचे, उनके पीछे अन्य सभी बालक भी दौड़ते हुए आ पहुँचे। बालक विनायकने उस ज्योतिषीको प्रणाम किया और पूछा आप कहाँसे आये हैं? ॥ ३२-३३ ॥ आप सामुद्रिकशास्त्रके अनुसार शरीरके लक्षणोंको जानते हैं, ज्योतिःशास्त्रमें पारंगत हैं तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमानकी सभी बातोंके जाननेवाले हैं, आप मेरे भाग्यका फल बताइये ॥ ३४ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर उस कपटी ब्राह्मणने बालक विनायककी बातोंको धैर्यपूर्वक सुनकर मनमें यह विचार किया कि मेरे कल्याणका रास्ता कौन-सा है? इसने तो अनेक रूप धारण करनेवाले बहुत-से बलवान् दुष्टोंको मार डाला है। तब उस ज्योतिषीने बालक विनायकका हाथ पकड़कर शुभ तथा अशुभ फल बताना प्रारम्भ किया ॥ ३५-३६ ॥ आजसे चार दिनके बाद तुम कुएँमें गिर पड़ोगे, कदाचित् वहाँसे बचकर निकल आओगे, तो तुम समुद्रमें डूब जाओगे। वहाँसे भी अगर बच निकलोगे तो अन्धकारपूर्ण किसी गहन गड्ढेमें गिर पड़ोगे। अगर वहाँसे बच गये तो तुम्हारे ऊपर कोई पर्वत गिर पड़ेगा ॥ ३७-३८ ॥ फिर भी अगर तुम बच जाओगे तो दो बहुत विशाल कालपुरुष तुम्हें खा जायेंगे। इस प्रकारके अरिष्ट तुम्हारे लिये होनेवाले हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब मैं तुम्हें इन अरिष्टोंके निवारणका उपाय भी बताता हूँ। निर्भय रहनेके लिये इस उपायको करो। यहाँसे कहीं अन्यत्र चलकर मेरे साथ चार दिन रहो ॥ ३९-४० ॥ मैं तुम्हारे चरणकमलोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें पुनः यहाँ ले आऊँगा। बालक विनायक ज्योतिषीकी बात सुनकर धीरे-से घरके अन्दर प्रविष्ट हो गये। तदुपरान्त बालक विनायकने शीघ्र ही राजाके हाथसे रत्ननिर्मित अँगूठी लेकर उसे अपने हाथमें छिपाकर उस द्विजसे कहा— ॥ ४१-४२ ॥ अरे ज्योतिषी ! शीघ्र आप बतायें कि हमारी कौन- सी वस्तु खो गयी है, किसने उसे लिया है और वह पुनः कब प्राप्त होगी? आपके सत्य-सत्य बतानेपर ही आपकी बातोंपर विश्वास होगा ॥ ४३ ॥ बालक विनायकद्वारा इस प्रकार कहा गया वह ज्योतिषी विचार करके लोगोंकी सभामें मुसकराकर इस प्रकार बोला— 'यदि वह अँगूठी मिल जाती है तो मुझे ही देनी होगी, तभी मैं उसके विषयमें बता सकता हूँ।' बालक विनायकके द्वारा 'ठीक है, ऐसा ही होगा' कहनेपर वह बोला— 'वह अँगूठी तुम्हारे ही हाथके अन्दर है'। उस छद्मवेषधारी ज्योतिषीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बालक विनायकने उस अभिमन्त्रित अँगूठीसे तत्काल ही उसके हृदयमें आघात किया ॥ ४४-४६ ॥ उस अँगूठीके प्रहारसे वह गणक उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हृदयवाला हो गया, जैसे कि वज्रके प्रहारसे पर्वत विदीर्ण हो जाता है। वह गणक पृथ्वीको अत्यन्त कँपाते हुए भूतलपर गिर पड़ा ॥ ४७ ॥ गिरते हुए उसके शरीरसे नगरका कुछ हिस्सा भी चूर-चूर हो गया। उस समय काशिराजके साथ ही सभी लोग भी अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४८ ॥ सभी देवता अत्यन्त हर्षित हो उठे और फूलोंकी वर्षा करने लगे। उस समय स्वर्गलोक तथा भूलोकमें बजाये जानेवाले वाद्योंके निर्घोषसे आकाश तथा पृथ्वीमण्डल प्रतिध्वनित हो उठा ॥ ४९ ॥ लोग कहने लगे— इस बालक विनायकने यह कैसे जान लिया कि यह तो अत्यन्त दुष्ट दैत्य है, जो ब्राह्मणका वेष धारणकर आया है, दैवयोगसे यह अच्छा हुआ कि राजाने भी उस दुरात्माकी बात नहीं मानी ॥ ५० ॥ इसे सामान्य बालक नहीं समझना चाहिये। पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये कोई करुणासागर देवता ही महर्षि कश्यपके घरमें अवतीर्ण हुआ है ॥ ५१ ॥ केवल अँगूठीके प्रहारसे इसने इस बलवान्‌के प्राण