श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 387 of 656
Read in contextक्री०ख०-अ०४८ ] * ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना * ३८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 **मुनि बोले—**ऐसा कहकर महादेव भगवान् शंकरने अत्यन्त रमणीय बने हुए मन्दिरमें गण्डकी नदीसे प्राप्त (शालग्राम) शिलासे निर्मित ढुण्ढिविनायककी मूर्तिको स्थापित किया॥ २०॥ तदनन्तर भगवान् शिव अपने भवनमें तथा अन्य सभी देवता भी अपने-अपने स्थानोंको गये। उन भगवान् शंकरने अपने भक्त दिवोदासको मुक्ति प्रदान की॥ २१॥ **गृत्समद बोले—**इस प्रकार उन ढुण्ढिविनायक तथा बौद्धरूपी विष्णुने अपनी मायाद्वारा राजा दिवोदासको मोहित किया और परिणाममें उनका कल्याण किया। हे देवि कीर्ते ! इस प्रकार मैंने ढुण्ढिराजद्वारा किये गये कार्यों तथा उनके सामर्थ्यको तुमसे पूर्ण रूपसे कहा, इस प्रकारके प्रभाववाले उन ढुण्ढिके वरदानसे ही तुम्हारा पुत्र जीवित हुआ है॥ २२-२३॥ **ब्रह्माजी बोले—**इस प्रकार प्रियव्रतकी रानी कीर्तिसे उन ढुण्ढिराजके समस्त कार्योंका वर्णन करके मुनि गृत्समद उनसे विदा लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम- स्थलको चले गये॥ २४॥ तदनन्तर उसी समय रानी कीर्ति अपने पुत्रको लेकर उस पुण्यदायिनी वाराणसीपुरीको गयी, जो कि वहाँ मृत्यु होनेपर मुक्ति प्रदान करनेवाली है॥ २५॥ वहाँ पहुँचकर वह ढुण्ढिके मन्दिरमें गयी, और वहाँ नर-नारियोंद्वारा किये जा रहे महोत्सवको देखकर अत्यन्त हर्षित होकर रानी कीर्तिने ढुण्ढिविनायकको प्रणाम किया। उस दिन माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथि और मंगलवारका दिन था॥ २६ १/२ ॥ वहाँ नृत्य एवं गीतमें पारंगत भक्तजनोंद्वारा अनेक स्वर्णपात्रोंमें रखे गये पक्वान्नों तथा खीरके नैवेद्य आदिके द्वारा ढुण्ढिका पूजन किया गया था। उन्हें विविध प्रकारके अलंकारोंद्वारा सुसज्जित किया गया था। दिव्य माला तथा वस्त्र उन्हें पहनाये गये थे। वे नाना प्रकारकी मणियोंसे समन्वित थे। विविध प्रकारकी मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे और भक्तोंद्वारा दक्षिणाके रूपमें सुवर्ण तथा रत्न उन्हें निवेदित किये गये थे॥ २७-२९॥ वह निष्पाप कीर्ति देव ढुण्ढिके मुखका दर्शन न हो पानेसे अत्यन्त चिन्तित हो उठी। वह यह भी सोच रही थी—कि मुझ अकिंचनके द्वारा इन्हें क्या निवेदित किया जाय ? ॥ ३०॥ उसने मार्गमें चलते समय एकत्र किये गये दूर्वांकुरों, शमीपत्रों तथा मन्दारके पुष्पोंसे अत्यन्त श्रद्धाभक्तिपूर्वक उन ढुण्ढिविनायकका पूजन किया और उनसे पुत्रके अभ्युदयकी प्रार्थना की॥ ३१॥ वे ढुण्ढि उसके तथा उसके पुत्रद्वारा शमीपत्र, मन्दार पुष्प एवं दूर्वांकुरोंसे की गयी पूजासे जितने प्रसन्न हुए, उतने प्रसन्न तो अन्य भक्तोंद्वारा की गयी सुवर्णादि विभिन्न उपचारोंकी पूजासे भी नहीं हुए॥ ३२॥ तदनन्तर वे सभी भक्तजन अत्यन्त उल्लसित होकर अपने-अपने घरोंको चले गये और माता तथा पुत्र वे दोनों उन ढुण्ढिराजकी सन्निधिमें स्थित रह गये॥ ३३॥ उन दोनोंके उपवाससे और श्रद्धा-भक्तिभावसे अत्यन्त प्रसन्न भगवान् महोत्कट ढुण्ढिराज उस मूर्तिमेंसे उनके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हो गये॥ ३४॥ वे दोनों बोले— [हे भगवन् ! ] मुनि गृत्समदने महेश्वर ढुण्ढिराजका जो स्वरूप बतलाया था, वही अत्यन्त प्रकाशमान स्वरूप आज हमें बड़े ही पुण्य- संचयोंके फलस्वरूप साक्षात् दिखायी दिया है, जो कि सभी प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत है, मस्तकपर मुकुटसे सुशोभित है, दस भुजाओंवाला है, अत्यन्त सुन्दर नेत्रकमलोंसे शोभायमान है, अत्यन्त मूल्यवान् रत्नों एवं मोतियोंसे बनी श्रेष्ठतम मालाको धारण किये हुए है, उसने पीताम्बर धारण कर रखा है, और अत्युत्तम दाँतसे सुशोभित है॥ ३५-३७॥ इस प्रकारके परम स्वरूपका दर्शनकर वे दोनों माता-पुत्र आनन्दके सागरमें इतना निमग्न हो गये कि उनका पूजन करना तथा उन्हें नमस्कार करना भी वे भूल गये॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् ढुण्ढि बोले—हे सुव्रते ! वर