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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

by महर्षि व्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished656 pages

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Page 419

क्री०ख०-अ०६० ] * भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध * ४१७ व्यक्तिको मूर्च्छा होती है, वैसी ही प्रबल मूर्च्छा उसको परशुके आघातसे हुई। कुछ कालके बाद वह दैत्य उठ खड़ा हुआ और दोनों हाथोंमें दो पर्वतोंको उठाकर विनायकको मारनेकी इच्छासे उनपर फेंक दिया। तब उन विनायकने सुखपूर्वक पर्वतोंको परशुके आघातसे सैकड़ों खण्डकर चूर-चूर कर दिया ॥ ३०-३१॥ इसके पश्चात् दैत्यराज मायासे विविध रूप धारण करने लगा। वह जो-जो रूप धारण करता, विनायक भी तत्काल उसी-उसी रूपमें प्रकट हो जाते और उन रूपोंके द्वारा शीघ्रतासे महादैत्यके अहंकारको चूर्ण कर देते। असुरके द्वारा प्रयुक्त शस्त्रोंका उन्हीं शस्त्रोंसे और नानाविध अस्त्रोंका वैसे ही अस्त्रोंसे विनायकदेव निवारण कर रहे थे ॥ ३२-३३ ॥ तदुपरान्त उन दोनोंमें परस्पर मल्लयुद्ध होने लगा। वे चरणोंसे चरणोंको, हाथोंसे हाथोंको, घुटनोंसे घुटनोंको और वक्षःस्थलसे वक्षःस्थलको आहत करते हुए [रक्तरंजित हो गये और उस दशामें वे] फूलोंसे लदे पलाशवृक्ष- से जान पड़ते थे। [इस प्रकार द्वन्द्वयुद्ध करते-करते] वे भूतलपर गिर पड़े ॥ ३४-३५॥ तदुपरान्त वे दोनों बली योद्धा उठकर एक-दूसरेको कोहनीसे मारने लगे। फिर रक्तसे लथपथ होकर उन्होंने पृष्ठभागसे पृष्ठभागको, ललाटसे ललाटको और टखनोंसे टखनोंको आहत किया ॥ ३६ १/२ ॥ इसके पश्चात् नरान्तकने भगवान् शिवका स्मरण करके [पर्वतोंसहित] वृक्षोंकी [मायामयी] सृष्टि की और वृक्षोंसे भरे वे पर्वत विनायकको मारनेकी इच्छासे उनपर फेंके, किन्तु उनको समीप आनेसे पहले ही उन विनायकने छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ३७-३८॥ [वृक्षोंसे युक्त] उन पर्वतोंको जब विनायकने कमल, पाश, अंकुश और प्रचण्ड प्रहार करनेवाले परशुसे ध्वस्त कर दिया तो उस दैत्यने एक दूसरी वैसी ही पर्वत-वर्षा की। उसके निवारित होनेपर पुनः वर्षा की और जब दैत्यने फिर [मायामयी पर्वत-] वर्षा की तो विनायकने उसे भी निरस्त कर दिया। इधर काशिराज विनायकको मरा जानकर दूर चले आये ॥ ३९-४० ॥ तब [लीलावश] विनायक व्यथित हो उठे और मनमें सोचने लगे कि इस दैत्यके पराक्रमकी तो कोई सीमा ही नहीं है तथा इसपर विजय पानेका कोई उपाय भी नहीं दीखता ॥ ४१ ॥ कब देवगण शत्रुहीन होकर अपने-अपने लोकोंको प्राप्त करेंगे। यह नरान्तक तो आज देवान्तक अर्थात् देवताओंका भी विनाशक बना हुआ है। जब विनायक इस प्रकार बारम्बार चिन्ता कर रहे थे, तभी उनके तरकसमें [एकाएक] कालदण्डके समान प्रचण्ड बाण आ-आकर गिरने लगे और उनके समक्ष स्वर्णनिर्मित पिनाक नामक धनुष भी आ गिरा, जो अपने तेजसे दिशाओं और विदिशाओं (ईशान आदि कोणों)-को उद्भासित कर रहा था ॥ ४२-४४ ॥ छिटकती हुई कान्तिवाले उस शैव धनुषको देखकर वे हर्षयुक्त हो गये और उन्होंने देवताओंके मनोरथको सिद्ध तथा दैत्यको पराजित समझा। विनायकने उच्चस्वरसे प्रचण्ड घोष करके धनुष और बाणोंको ग्रहण कर लिया और पिनाकको [अपनी बहुरूपी तुलामें] तौला। तदुपरान्त उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी ॥ ४५-४६॥ विनायकदेवने दोनों ओर [अपने कन्धोंमें] तरकस व्यवस्थित किये और भूमिपर घुटने टिकाकर धनुषकी टंकार [की, जिसे] सुनकर तीनों लोक काँप उठे। अपने बायें और दायें दोनों हाथोंसे [धनुषपर बाण रखकर] उन्होंने धनुषको खींचा और दैत्यको लक्ष्य करके दोनों बाण छोड़ दिये। चिनगारियाँ बरसाते, आकाशको चमकाते, प्राणिसमूहका संहार करते और गरजते हुए वे बाण सहसा दैत्यकी भुजाओंके ऊपर जा गिरे ॥ ४७-४९ ॥ उन बाणोंने दैत्यकी भुजाओंको वैसे ही गिरा दिया, जैसे उल्काने वृक्षको गिराया हो अथवा इन्द्रने वज्रके आघातसे पर्वतशिखरोंको ढहा दिया हो ॥ ५० ॥ उन विशाल भुजाओंमें-से एक तो नरान्तकके दरवाजेपर जा गिरी और दूसरी बरतनोंको तोड़ती-