श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextक्री०ख०-अ०१०२] * दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वरके युद्धका वर्णन * ५१७
[बायाँ स्तम्भ]
प्राप्त हो गये, कुछ भाग चले और कुछ सैनिक भूमिपर गिर पड़े। अत्यन्त बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न उस दैत्यराज कमलासुरकी प्रशंसा करते हुए देव मयूरेशने कहा—हे दैत्यराज ! तुम बड़ी कुशलतासे युद्ध कर रहे हो, मैंने इस प्रकारका कोई योद्धा देखा नहीं है ॥ ४-५ ॥
ऐसा कहकर देव मयूरेशने शत्रु कमलासुरके ऊपर गरुडास्त्र छोड़ा, तब सर्प भाग गये और इधर मयूरेश्वरके सैनिक उठ खड़े हुए ॥ ६ ॥
तदनन्तर देव मयूरेशने चक्रास्त्र छोड़ा, जो दैत्यसेनाका संहार करनेवाला था, उस चक्रास्त्रके प्रहारसे कुछ दैत्य मर गये और किन्हींके पैर तथा मस्तक कट गये ॥ ७ ॥
किन्हींके जानु और जंघा कट गये और कुछ गुल्फके कट जानेसे भूमिपर गिर पड़े। वे 'भागो, भागो' इस प्रकारसे और 'हे माता ! हे पिता ! हे भ्राता !' इस प्रकारसे चिल्ला रहे थे ॥ ८ ॥
जिन्होंने मयूरेश्वरका दर्शन करते हुए प्राणोंको छोड़ा था, वे दैत्य मुक्तिको प्राप्त हो गये। इस प्रकारसे दैत्य कमलासुरकी सारी सेना परास्त हो गयी और तब दैत्य कमलासुर अत्यन्त क्रुद्ध होता हुआ दौड़ पड़ा ॥ ९ ॥
वह हाथमें खड्ग धारणकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गर्जना करते हुए बड़े वेगसे गजाननकी ओर आया। उस प्रकारके शत्रुको देखकर प्रभु मयूरेशने हाथमें परशु धारण कर लिया। वे दैत्यकी ओर दौड़ पड़े और उन्होंने अत्यन्त वेगसे उस परशुको कमलासुरपर छोड़ा। उस परशु नामक आयुधने अपने तेजसे आकाश, दिशाओं तथा पक्षिसमूहोंको जलाते हुए दैत्यके हाथमें विद्यमान खड्गको बड़े वेगसे काट डाला, जिससे उस खड्गके सौ टुकड़े हो गये ॥ १०-११ १/२ ॥
खड्गके टूट जानेपर उसने एकाएक धनुषको उठा लिया और उसपर डोरी चढ़ाकर बहुतसे बाणोंका संधानकर उनसे बलपूर्वक असंख्य सैनिकोंको बींधते हुए उन बाणोंसे आकाश एवं समस्त दिशाओंको आच्छादित कर डाला। फिर वह दैत्य मेघकी ध्वनिके समान गर्जना करने लगा ॥ १२-१३ ॥
उन बाणोंके द्वारा अन्धकार छा जानेपर कोई
[दायाँ स्तम्भ]
भी कहीं भी दिखायी नहीं दे रहा था। तदनन्तर बलवान् मयूरेशने अपने बाणोंके आघातसे दैत्यद्वारा छोड़े गये बाणोंके जालका निवारणकर शीघ्र ही उस कमलासुरके घोड़ेको भूमिपर गिरा दिया। तब वह कमलासुर अन्तरिक्षमें चला गया और वहाँसे गणनायक मयूरेशसे कहने लगा— ॥ १४-१५ ॥
तुमने मेरे घोड़ेको गिरा डाला है, तो अब तुम मेरे महान् कौतुकको देखो। हे गुणेश्वर ! मैं तुम्हारे देखते-देखते तुम्हारे मोरको मार डालूँगा ॥ १६ ॥
तदनन्तर दैत्य कमलासुरने अपने दोनों तूणीरोंमें स्थित बाणोंको नीचे भूमिमें गिराया और धनुषको कानतक खींचकर उन बाणसमूहोंको मयूरेश्वरकी सेनाकी ओर चलाया। उसने मयूरेशकी सेनाके सभी सैनिकोंको मारते हुए बाणोंके जालकी इस प्रकार वर्षा की, जैसे कि वर्षाऋतुमें मेघ वर्षा करते हैं ॥ १७-१८ ॥
उस शरवर्षाके द्वारा मयूरेशकी सेनाके कुछ गणोंके शरीरके सभी अंग कट गये, कुछ देवोंने प्राणोंका त्याग कर दिया। इस प्रकारसे अपनी सेनाके वीरोंको विनष्ट होते देखकर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने कमलासुरके बाणोंसे आविद्ध अपने वाहन मयूरको छोड़कर पाश उठाकर अपने हाथमें आदरपूर्वक ले लिया ॥ १९-२० ॥
उन्होंने आकाशको गुँजाते हुए भयंकर गर्जना की और अत्यन्त तेजस्वी उस पाशको छोड़ा। उस पाशने दैत्यगणोंको गिराते हुए शत्रुसैनिकोंको जला डाला ॥ २१ ॥
तदनन्तर वह पाश दैत्यसेनाके अधिपति कमलासुरके कण्ठमें जाकर लगा, जिससे उसका श्वास रुक गया। तब उस दैत्यने अपना दूसरा रूप बना लिया ॥ २२ ॥
उसने उसी क्षण अपने सिरसे सूर्यमण्डलको ढक दिया। अत्यन्त घोर अन्धकार छा जानेके कारण उस समय कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था ॥ २३ ॥
इसके बाद वह दैत्य अत्यन्त क्रोधाविष्ट होकर मयूरेशके सामने आ खड़ा हुआ और बोला—अरे बालक ! तुम मेरे साथ युद्ध क्यों कर रहे हो, जाओ अपनी माताके स्तनोंका पान करो ॥ २४ ॥