गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] अर्श ( बवासीर )-निदान २७७
है। रक्ताधिक्य अर्श होनेसे मांसांकुरके लक्षण पित्तज अर्शके समान ही होते हैं। इसमें रक्तसे भरे हुए वटकी वरोहक सदृश, लाल गुञ्जाफल और मूँगेके समान रक्त होते हैं। उन लाल अंकुरोंपर जब गाढ़े मलका दबाव पड़ता है, तब वे अत्यधिक मात्रामें विकृत गाढ़े रक्तका प्रवाह करते हैं। उस समय रोगीको पीड़ा भी अधिक होती है। अधिक मात्रामें रक्तके गिर जानेसे रोगी मेढ़कके समान पीला पड़ जाता है। उस दुर्बलतामें उत्पन्न हुए अनेक कष्टोंसे पीड़ित रहता है। वह वर्ण, बल, उत्साह और ओज सभीसे रहित हो जाता है। उसकी इन्द्रियाँ कलुषित हो जाती हैं। मूँग, कोदो, जम्बीर (नीबू), ज्वार, करील और चनाका आहार करनेसे उसके गुदाभागमें वायु कुपित हो उठती है और बलपूर्वक वह अधोवर्ती विष्ठादिके स्रोतोंको अवरुद्ध कर उनके मल-मूत्रादिको सुखाकर कष्टप्रद बना देती है। उसके कुप्रभावसे रोगीके कोख, पार्श्व, पीठ और हृदयभागमें भयंकर पीड़ा होती है। पेटमें मलके रहनेसे हृदयमें धड़कन होती है, अधिक पीड़ा रहती है, वस्तिभागमें शूल होता है और गण्डस्थलमें शोथ आ जाता है।
शरीरमें जब वायु ऊर्ध्वगामी हो जाता है तो उसके कारण रोगीको वमन, अरुचि, ज्वर, हृदयरोग, संग्रहणी, मूत्रदोष, बहरापन, सिरपीड़ा, श्वास, चक्कर, खाँसी, पीनस, मनोविकार, तृष्णा, श्वास (कास), पित्त, गुल्म तथा उदरादिके रोग होते हैं, वे सभी वातज रोग हैं। इनका स्वभाव अत्यन्त कठोर और कष्टकारी होता है। वातदोषका यह प्रकोप ही दुर्नामा, मृत्यु तथा उदावर्त अर्थात् वायुगोलाके नामसे स्वीकार किया गया है। इस वातदोषसे पीड़ित कोष्ठ-भागोंमें यह रोग पूर्वोक्त कारणोंके बिना भी उत्पन्न हो जाता है। सहज अर्श, जन्म धारणके पीछे त्रिदोषसे उत्पन्न हुए अर्श और भीतरवाली बलिमें उत्पन्न अर्श असाध्य होता है। परंतु यदि अग्निबल और आयु शेष हो तथा सम्यक् चिकित्सा हो तो असाध्य रोग भी कष्टसाध्य हो जाते हैं।
गुदाभागकी दूसरी बलिमें जो अर्शांकुरोंका समूह होता है, वह द्वन्द्वज अर्शांकुरोंका समूह माना जाता है। इसकी तत्काल वर्ष-भीतर ही चिकित्सा अपेक्षित होती है अन्यथा यह भी कष्टसाध्य हो जाता है। गुदाभागकी बाहरी बलिमें त्रिदोषजन्य जो अर्शांकुर होते हैं, उनको सामान्य औषधिके उपचारसे दूर किया जा सकता है, किंतु अधिक समय बीत जानेपर वे भी कष्टसाध्य हो जाते हैं।
मेदादि स्थानोंमें इसी प्रकारके अर्श होते हैं। ऐसा ही नाभिदोषके कारण उत्पन्न हुए अर्शांकुरोंका स्वभाव माना गया है। जो अर्शांकुर गण्डस्थल (गुदाके भीतर)-में होते हैं, उनका रूप पिच्छिल (फिसलाहटसे युक्त) तथा कोमल होता है। व्यानवायु कफको आभ्यन्तरभागसे निकालकर त्वचाके बाह्य प्रदेशपर अर्शके रूपमें परिवर्तित कर देता है। वह कीलके समान स्थिर तथा खर होता है। उसको विद्वानोंने चर्मकील (या मस्सा)-के नामसे स्वीकार किया है। वातज दोषके कारण उत्पन्न चर्मकील (मस्सा) अत्यन्त कठोर सूईकी नोकके समान तीक्ष्ण वेदनावाला और खुरदुरापनयुक्त होता है। पित्तदोषसे उत्पन्न हुआ कीलक कृष्ण, लाल मुखभागवाला माना गया है और जो कफजनित होता है, उसमें स्निग्धता, ग्रथिता तथा त्वचा वर्णता होती है।
बुद्धिमान् व्यक्तिको अर्शरोग होनेपर यथाशीघ्र उसके उपशमनका प्रयत्नपूर्वक प्रयास करना चाहिये। क्योंकि वे शान्त नहीं होनेपर शीघ्रातिशीघ्र शरीरके गुह्य-प्रदेश तथा उदरभागमें बद्धगुदोदर आदि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न कर देते हैं। (अध्याय १५६)
१-सु०नि०अ० ५६, अ०हृ०नि०अ० ७। २-च०चि०अ० १५, सु०नि०अ० २, अ०हृ०नि०अ० ७।