गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| ३४० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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गोखरूकी जड़को दूधमें मिलाकर पान करनेसे कामला एवं मुखरोगका विनाश होता है। चमेली और बेरकी जड़को मट्ठेके साथ पीनेसे अजीर्ण रोग दूर होता है।
कुशकी जड़, वानरीमूल, वकुची तथा कांजीका मिश्रित योग दाँतोंके रोगका विनाशक है। इन्द्रवारुणीकी जड़को जलके साथ पीनेसे विषादि-दोष नष्ट होते हैं। हे शिव! चम्पाकी जड़को पान करनेसे भी उक्त दोष दूर हो सकते हैं। कांजीके साथ गुञ्जा (घुँघची)-का चूर्ण मस्तकपर लेप करनेसे सिरका रोग विनष्ट हो जाता है।
बला, अतिबला, मधुयष्टि, शर्करा तथा मधुका पान करके वंध्या स्त्री गर्भ-धारण करनेमें समर्थ हो जाती है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
श्वेत अपराजिताकी जड़, पिप्पली और सोंठका पिसा हुआ लेप सिरमें लगानेसे शूल नष्ट हो जाता है। निर्गुण्डीकी फुनगीको पीसकर पान करनेसे गण्डमाला नामक रोग दूर हो जाता है।
केतकीके पत्तोंका क्षार गुड़के साथ अथवा मट्ठेके साथ शरपुंखाका सेवन करनेसे प्लीहा रोग विनष्ट हो जाता है।
बिजौरा नीबूका निर्यास (गोंद), गुड़ और घीके साथ मिलाकर पान करनेसे वात-पित्तजनित शूल दूर होता है। सोंठ, काला नमक तथा हींगका पान हृदयरोगका विनाशक है। (अध्याय १८४)
गणपतिमन्त्रका औषधिक योग तथा शोथ, अजीर्ण, विसूचिका और पीनस आदि विविध रोगोंके उपचार
श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! 'ॐ गं गणपतये नमः' भगवान् गणेशका यह मन्त्र धन और विद्या प्रदान करनेवाला है। इस मन्त्रका एक हजार आठ बार जप करनेके बाद अपनी शिखाको बाँधनेवाला व्यक्ति वाद-विवादके व्यवहारमें विजय प्राप्त करता है। एक सौ बार इस मन्त्रका जप करनेवाला प्राणी अन्य लोगोंका प्रिय बन जाता है।
काले तिलोंको घृतमें मिलाकर इस मन्त्रसे एक हजार आठ आहुतियाँ देनेसे मात्र तीन दिनमें राजा वशमें हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको उपवास रखकर मनुष्य यदि विधिवत् विघ्नराज गणेशका पूजन करे और तिल तथा अक्षतको मिलाकर एक हजार आठ बार उन्हें आहुति प्रदान करे तो वह युद्धमें अपराजित होता है और सभी लोग उसकी सेवा करते हैं। उपर्युक्त मन्त्रका एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार जप करके अपनी शिखा बाँधनेवाला प्राणी राजकुल तथा वाद-विवादके व्यवहारमें विजय प्राप्त करता है।
भृंगराज, सहदेवी (सहदेई), वचा (वच) और श्वेत अपराजिता नामक औषधियोंके रसका तिलक करके मनुष्य तीनों लोक वशमें कर सकता है।
काकजंघाका मूल और दूधका मिश्रित पान शोथ रोगका विनाशक है।
अश्वगन्धा, नागबला, गुड़ तथा उड़द मिलाकर खानेवाला पुरुष वैसे ही रूप-सौन्दर्यसे युक्त हो जाता है, जैसे नवयुवकोंका सौन्दर्य होता है।
हे रुद्र! लौहचूर्ण और त्रिफलाचूर्णका मधुके साथ प्रयोग करनेसे परिणाम नामक शूलका विनाश होता है। हे वृषध्वज! हींग, काला नमक और सोंठ—इन औषधियोंके क्वाथका पान सभी प्रकारके शूलोंका अपहारक है। सामुद्रलवणसे युक्त अपामार्गकी जड़का सेवन करनेसे अजीर्ण-शूल नष्ट हो जाता है।