गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextकाण्ड ] विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार ३४७
सामान्य अथवा कृत्रिम विषका प्रभाव नष्ट हो जाता है। सेंधा नमकके साथ गरम गोघृतका पान बिच्छूके डंक मारनेसे शरीरमें उत्पन्न विषकी वेदनाको दूर करता है। हे शिव ! कुसुम्भ (कुसुम), कुंकुम, हरिताल, मैनसिल, कंजा और मन्दार-वृक्षकी जड़ पीसकर पान करनेसे मनुष्योंमें चढ़ा हुआ सर्प या बिच्छूका विष नष्ट हो जाता है। हे हर ! दीपकका तेल लगानेसे सामान्य ततैया आदि कीटोंका विष दूर हो जाता है। इससे कनखजूरेका भी विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। बिच्छूके डंक लगे हुए स्थानपर सोंठ तथा तगरका लेप लगानेसे विष नष्ट हो जाता है। इसी लेपसे मधुमक्खीके डंकका भी विष दूर किया जा सकता है तथा सोया, सेंधा नमक और घृतका मिश्रित लेप लगानेसे भी वह विष दूर हो जाता है। हे महादेव ! शिरीषके बीजोंको गरम दूधमें घिसकर उसका लेप लगानेसे कुत्तेका विष नष्ट हो जाता है। प्रज्वलित अग्नि और उष्ण जलसे सेंकनेपर मेढकका विष दूर हो जाता है। हे चन्द्रचूड ! धत्तूरके रससे मिश्रित दूध, घी और गुड़का पान कुत्तेके विषको नष्ट कर देता है।
बरगद, नीम और शमी वृक्षकी छालके क्वाथसे सेंक करनेपर मुख और दाँतकी विष-वेदना नष्ट हो जाती है। देवदारु और गैरिकके चूर्णका लेप करनेसे भी इस विषको शान्त किया जा सकता है। हे हर ! नागेश्वर, दारुहल्दी, हल्दी तथा मजीठके मिश्रित लेपसे लूता (मकड़ी)-के काटनेका विष दूर होता है। कंजेके बीज, वरुण-वृक्षके पत्ते, तिल और सरसोंका पिसा हुआ लेप भी विषको दूर कर देता है, इसमें संदेह नहीं है।
हे हर ! नमक और घृतसे युक्त घृतकुमारीके पत्तेका लेप करनेसे घोड़ेके शरीरकी खुजली दस दिनमें दूर हो जाती है। (अध्याय १९१)
विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मी-घृतादिके निर्माणकी विधि
श्रीहरिने कहा— [हे हर !] चित्रक आठ भाग, शूरण (सूरन) सोलह भाग, सोंठ चार भाग, काली मिर्च दो भाग, पिप्पलीमूल तीन भाग, विडंग चार भाग, मुशली आठ भाग और त्रिफला चार भाग लेकर इनके दुगुने गुड़के साथ मोदक बनाना चाहिये। इसके सेवनसे अजीर्ण, पाण्डु, कामला, अतिसार, मन्दाग्नि और प्लीहा नामक रोगोंको दूर किया जा सकता है।
बिल्व (बेल), अग्निमन्थ (गनियारी), श्योनाक (सोना पाढ़ा), पाटला (पाढर), पारिभद्रक (नीम), प्रसारिणी (गन्धप्रसारिणी), अश्वगन्धा, बृहती, कण्टकारी, बला, अतिबला, रास्ना (सर्पसुगन्धा), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), पुनर्नवा, एरण्ड, शारिवा (अनन्तमूल), पर्णी (शालपर्णी), गुडूची, कपिकच्छुका (केवाँच) नामक इन औषधियोंको दस-दस पलकी मात्रामें एकत्र करके शुद्ध जलमें पकाना चाहिये। जब उस जलका चौथाई भाग शेष रह जाय तो उससे तेलको सिद्ध करे। यदि बकरीका दूध अथवा गौका दूध हो तो उसको उस तैलपाकमें चौगुना मिलाकर तेलकी मात्राके समान शतावरी और सेंधा नमक भी मिलाये। इस प्रकार तैलपाकको सिद्ध करनेके पश्चात् उस तेलमें शतपुष्पा (सोया), देवदारु, बला, पर्णी, वचा (वच), अगुरु, कुष्ठ (कूट), जटामांसी, सेंधा नमक और पुनर्नवा एक-एक पल पीसकर मिलाना चाहिये। इस तेलका प्रयोग पीने, नस्य लेने तथा शरीरमें