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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

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काण्ड ] ध्यान-योगका वर्णन ३३


आरूढ होकर अन्तरिक्षमें मेरी रक्षा करें। हे अजित! हे अपराजित! आपको सदैव मेरा प्रणाम है। हे कूर्मराज! आपको नमस्कार है। हे महामीन! आपको नमस्कार है। हे सत्यस्वरूप महाविष्णो! आप अपनी बाहुको पञ्जर (रक्षक)-जैसा स्वीकार करके हाथ, सिर, अङ्गुली आदि समस्त अङ्ग-उपाङ्गसे युक्त मेरे शरीरकी रक्षा करें। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।

हे वृषध्वज! मैंने प्राचीन कालमें सर्वप्रथम भगवती ईशानी कात्यायनीकी रक्षाके लिये इस विष्णुपञ्जर नामक स्तोत्रको कहा था। इसी स्तोत्रके प्रभावसे उस कात्यायनीने स्वयंको अमर समझनेवाले महिषासुर, रक्तबीज और देवताओंके लिये कण्टक बने हुए अन्यान्य दानवोंका विनाश किया था। इस विष्णुपञ्जर नामक स्तुतिका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जप करता है, वह सदा अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेमें सफल होता है। (अध्याय १३)


ध्यान-योगका वर्णन

श्रीहरिने पुनः कहा—अब मैं भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले योगको कह रहा हूँ। योगियोंके द्वारा ध्यानगम्य जो देव हैं, उन्हें ही ईश्वर कहा जाता है। हे महेश्वर! उनके लिये किये जानेवाले योगको सुनें। यह योग समस्त पापोंका विनाशक है। योगीको आत्मस्वरूप परमात्माकी स्वयंमें इस प्रकार भावना करनी चाहिये—

मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही सभीका ईश्वर हूँ, मैं ही अनन्त हूँ और मैं ही छः ऊर्मियों<sup></sup> (शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा एवं पिपासा)-से रहित हूँ। मैं ही वासुदेव हूँ, मैं ही जगन्नाथ और ब्रह्मरूप हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंके शरीरमें स्थित रहनेवाला आत्मा और सर्वदेहविमुक्त परमात्मा हूँ। मैं ही शरीरधर्मसे रहित, क्षर<sup></sup> (समस्त प्रपञ्च), अक्षर (कूटस्थ चेतन भोक्ता)-से अतीत, मनके साथ पाँच इन्द्रियोंमें मूल शक्तिरूपसे स्थित मैं स्वयं अतीन्द्रिय (इन्द्रियोंसे अग्राह्य) होता हुआ द्रष्टा, श्रोता एवं घ्राता (गन्ध ग्रहण करनेवाला) हूँ।

मैं इन्द्रियधर्मसे रहित, जगत्का स्रष्टा, नाम और गोत्रसे शून्य, मननशील सबके मनमें स्थित देवता हूँ, किंतु मुझमें मन नहीं है और न तो उसका धर्म ही है। मैं ही विज्ञान<sup></sup> तथा ज्ञानस्वरूप<sup></sup> हूँ। मैं ही समस्त ज्ञानका आश्रय, बुद्धिरूप गुहामें स्थित प्राणिमात्रका साक्षी (तटस्थ द्रष्टा) तथा सर्वज्ञ और बुद्धिकी अधीनतासे मुक्त हूँ। मैं ही बुद्धिके धर्मोंसे भी शून्य हूँ, मैं ही सर्वस्वरूप, सर्वगतमनस्वरूप और प्राणिमात्रके किसी भी प्रकारके बन्धनसे सर्वथा विनिर्मुक्त तथा प्राणधर्म<sup></sup> (बुभुक्षा एवं पिपासा)-से विमुक्त हूँ। मैं ही प्राणियोंका प्राणस्वरूप हूँ, मैं ही महाशान्त, भयशून्य तथा अहंकारादिसे रहित हूँ और अहंकारजन्य विकारोंसे भी मैं रहित हूँ।

मैं जगत्का साक्षी, जगत्का नियन्ता और परमानन्दस्वरूप हूँ। जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति—इन सभी अवस्थाओंमें जगत्का साक्षी होते हुए भी मैं इन अवस्थाओंसे रहित हूँ। मैं ही तुरीय ब्रह्म और विधाता हूँ। मैं ही दृग्रूप<sup></sup> हूँ। मैं ही निर्गुण,


१. 'शोकमोहौ जरामृत्यू क्षुत्पिपासे षडूर्मयः' (शब्दकल्पद्रुम)।
२. 'क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते' (गीता १५। १७)-के अनुसार समस्त प्रपञ्च क्षर है। 'अक्षर'का अर्थ कूटस्थ है।
श्रीधरसरस्वतीने 'कूटस्थ'का अर्थ चेतन भोक्ता किया है।
३. 'विज्ञान'—परमार्थज्ञान। ४. 'ज्ञान'—व्यावहारिक ज्ञान। ५. बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य••••• (शब्दकल्पद्रुम)।
६. 'दृग्रूप' का तात्पर्य यह है—समस्त प्रपञ्च द्रष्टा, दृश्य एवं दृष्टि—इन तीनोंमें अन्तर्हित है। परमेश्वर विष्णु ही द्रष्टा हैं, वे ही दृश्य हैं, दृष्टि भी वे ही हैं। यह दृष्टि ही 'दृग्' शब्दसे कही जाती है।