BharatKosha
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 441 of 634

Read in context
Page 441

काण्ड ] अच्युतस्तोत्र [ ४३१


कमलकी माला धारण करनेवाले, जगत्में प्रतिष्ठित, पीताम्बरसे अलंकृत, नृसिंहस्वरूप और वैकुण्ठमूर्ति श्रीविष्णुको बारम्बार नमन करता हूँ।

मेरा उन देवको प्रणाम है, जिनकी नाभिमें कमल है, जो क्षीरसागरमें शयन करनेवाले हैं, जिनके हजारों सिर हैं, जो शेषशय्यापर शयन कर रहे हैं, जिनके हाथमें परशु है, जो क्षत्रियोंके गर्वका अन्त करनेवाले हैं, जो सत्यप्रतिज्ञ हैं, जो अजित हैं, जो त्रिभुवनके एकमात्र स्वामी और चक्रधारी हैं, उन कल्याणमूर्ति, सूक्ष्मस्वरूप और पुराणपुरुषको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ। दैत्यराज बलिके राज्यको दानमें ग्रहण करनेके लिये भगवान् वामन तथा पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये यज्ञवराहका अवतार ग्रहण करनेवाले गोविन्द श्रीहरिको मेरा बार-बार प्रणाम है।

हे परमानन्दस्वरूप! हे ज्ञान देनेवाले परम अक्षर ज्ञानस्वरूप! देव! परमाद्वैत! पुरुषोत्तम! विश्वकर्ता! विश्वभावन! विश्वनाथ! विश्वके कारणभूत! मधुदैत्यविनाशक! रावणहन्ता! कंस तथा केशीको मारनेवाले! कैटभ दैत्यको मारनेवाले! आपको नमस्कार है। हे पद्मलोचन! हे गरुडध्वज! कालनेमिके हन्ता! गरुडासन! देवकीपुत्र! वृष्णिनन्दन! रुक्मिणीकान्त! अदितिनन्दन! गोकुलवासी! हे गुरुकुलप्रिय आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।

हे गोपवपु श्रीकृष्ण, गोपीजनप्रिय, गोवर्धनधारी! हे गोकुलवर्धन! आपकी जय हो। हे दैत्यराज रावणके संहारक! चाणूरदैत्य-विनाशक, वृष्णिवंशके प्रकाशक! कालीयमर्दन! सत्यस्वरूप! संसारके साक्षी! सर्वार्थसाधक! हे वेदान्तविदोंके वेद्य! सब कुछ देनेवाले! माधव! सबके आश्रय! अव्यक्त, सर्वत्र व्याप्त! लक्ष्मीकान्त (माधव), सूक्ष्म, चिदानन्द! चित्त निरञ्जन, निरालम्ब! हे शान्त! हे सनातन! हे नाथ! हे जगत्पूज्य भगवान् विष्णु! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आपको मेरा नमस्कार है।

हे हरे! आप ही गुरु हैं, आप ही शिष्य हैं। आप ही दीक्षामें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र तथा मण्डल हैं। आप ही न्यास, मुद्रा और दीक्षा हैं। आप ही पूजामें प्रयुक्त होनेवाले पुष्पादिक साधन हैं। आप ही आधारशक्ति, अनन्त, कूर्म, पृथिवी, पद्म, धर्म, ज्ञान, वेदी और पूजामण्डलकी शक्तियोंके स्वरूप हैं।

हे प्रभो! आप ही छलका भेदन करनेवाले हैं। आप ही खर-दूषणका संहार करनेवाले राम हैं। आप ही ब्रह्मर्षि, देव, विष्णु, सत्यपराक्रम, नृसिंह, परानन्द, धराको धारण करनेवाले महावराह हैं।

हे प्रभो! आप ही सुपर्ण, शंख, चक्र, गदा हैं। हे देव! आप ही लक्ष्मी, पुष्टि, शाश्वती माला, श्रीवत्स, कौस्तुभ, शार्ङ्गी* तथा तूणीर (तरकस)-रूप हैं।

हे प्रभो! ढाल और खड्गसे युक्त आप इन्द्रादिक दिक्पाल देवता हैं। आप ही विधाता और आप ही ब्रह्मा हैं। आप ही यम, अग्नि, कुबेर, ईशान, इन्द्र, वरुण, राक्षसोंके स्वामी, साध्य, वायु, चन्द्र, सूर्य, वसु, रुद्रगण, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण हैं। आप ही दैत्य, दानव, नाग, यक्ष, राक्षस, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, पितृजन तथा देवगण हैं। आप ही पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत, शब्दादि विषयस्वरूप और अव्यक्त इन्द्रिय हैं। आप ही मन, बुद्धि एवं अहंकारतत्त्व हैं। आप ही क्षेत्रज्ञ तथा हृदयेश्वर हैं। आपकी जय हो, आपको मैं प्रणाम करता हूँ।

हे हरे! आप ही यज्ञ, वषट्कार, ॐकार (प्रणव), समिधा और कुश हैं। आप ही यज्ञवेदी,


* 'शार्ङ्ग' नामका धनुष धारण करनेवाले।