गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextप्रेतकल्प ] राजा बभ्रुवाहनकी कथा ४१७
मन्त्रसे यमको द्वितीय चरु निवेदित करे। 'ॐ नमश्चाथ रुद्राय श्मशानपतये नमः'—इस मन्त्रसे श्मशानपति रुद्रको निवेदित करे। उसके बाद श्राद्धकर्ता सात नामवाले यमराजके लिये निम्न मन्त्रोंसे सात जलाञ्जलियाँ छोड़े—'ॐ यमाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ धर्मराजाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ मृत्यवे स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ अन्तकाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ वैवस्वताय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ कालाय स्वधा तस्मै नमः' और 'ॐ सर्वप्राणहराय स्वधा तस्मै नमः।'
इसके बाद श्राद्धकर्ता 'तुम सब अमुक-अमुक गोत्रसे सम्बन्धित हो, यह तिलोदक तुम्हारे लिये होवे'। ऐसा कहते हुए अर्घ्य-पुष्पसे युक्त दस पिण्ड-दान दे। उसके बाद उन्हें धूप, दीप, बलि, गन्ध तथा अक्षय जल प्रदान करे। उक्त दस पिण्डोंका दान देनेके पश्चात् भगवान् विष्णुके सुन्दर सुभग मुखका ध्यान करना चाहिये।
इस कृत्यको करनेके बाद आशौचके अन्तमें प्रतिमास मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण करना चाहिये। श्राद्ध चाहे अपने लिये हो या दूसरेके लिये यही नियम है। शक्ति, आरोग्य, धन और आयु—ये चारों अस्थिर होते हैं, अतः ऐसा जानकर जीवित-श्राद्ध करना चाहिये। मैंने इस जीवित-श्राद्धके विषयमें तुम्हें सब कुछ बता दिया है। (अध्याय ८)
राजा बभ्रुवाहनकी कथा, राजाद्वारा प्रेतके निमित्त की गयी और्ध्वदेहिक क्रिया एवं वृषोत्सर्गसे प्रेतका उद्धार
गरुडने कहा— हे निष्पाप देव! आपने यह कहा कि जब मनुष्यकी और्ध्वदेहिक क्रियाको करनेवाला कोई न हो तो उस आद्य क्रियाको राजा सम्पन्न कर सकता है। प्राचीनकालमें क्या किसी राजाने किसी ऐसे व्यक्तिकी और्ध्वदेहिक आदि क्रिया सम्पन्न की थी?
श्रीकृष्णने कहा— हे सुपर्ण! तुम सुनो! जिस राजाने इस क्रियाको किया था, मैं उसके विषयमें कहूँगा। कृतयुगमें वंग देशमें बभ्रुवाहन नामका एक राजा था। हे पक्षीन्द्र! वह समुद्रसे चारों ओर घिरी हुई अपनी पृथ्वीकी धर्मानुसार भलीभाँति रक्षा करता था। उसने अपने जीवनकालमें इस सम्पूर्ण पृथ्वीका विधिवत् भोग किया। उसके शासनकालमें कोई भी पापी नहीं था। प्रजाओंको न तो चोरका भय था और न तो दुष्टजनोंके द्वारा किये गये उपद्रवोंका आतंक था। उसके राज्यकालमें किसी भी प्रकारके रोगका भी भय नहीं था। सभी अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त थे। वह राजा तेजमें सूर्यकी भाँति, अक्षुब्धता (शान्ति)-में पर्वतके समान और सहिष्णुतामें पृथ्वीके सदृश था। किसी समय उस राजाने एक सौ घुड़सवार सैनिकोंको साथ लेकर मृगयाके लिये एक घने वनकी ओर प्रस्थान किया। उस समय योद्धाओंके सिंहनाद, शङ्ख तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिलकर निकले किलकिलाहटभरे शब्दोंसे वातावरण गूँज रहा था। वहाँ स्थान-स्थानपर चारों ओर उस राजाकी स्तुति हो रही थी। चलते-चलते उस राजाको नन्दनवनके समान एक वन दिखायी पड़ा। वह वन बिल्व, मंदार, खदिर, कैथ तथा बाँसके वृक्षोंसे परिव्याप्त था। ऊँचे, नीचे पर्वतोंसे चारों ओर घिरा हुआ था। जलरहित तथा निर्जन उस वनका विस्तार कई योजनका था। मृग, सिंह तथा अन्य महाभयंकर हिंसक जीव-जन्तु उसमें भरे हुए थे। अपने सेवक एवं सैनिकोंके साथ नाना प्रकारके मृगोंको मारते