गरुड़ पुराण
Garuda Purana
by महर्षि वेदव्यास
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अर्थात् भवन, गृह आदि, नगर, ग्राम, व्यापारिक पथ, प्रासाद, उद्यान, दुर्ग, देवालय तथा मठ आदिके निर्माणमें वास्तुदेवताकी स्थापनापूर्वक पूजा करनी चाहिये। बाईस* देवता बाह्यभागमें तथा तेरह देवता अन्तःभागमें अवस्थित रहते हैं।
यथा—ईश, शिखी, पर्जन्य, जयन्त, कुलिशायुध, सूर्य, सत्य, भृगु, आकाश, वायु, पूषा, वितथ, ग्रहक्षेत्र, यम, गन्धर्व, भृगुराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शेष, पाप, रोग, अहिमुख, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति तथा दिति—ये वास्तुमण्डलके बाह्य देव हैं।
—इन बाह्य देवोंका पूजन करके बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह ईशानादि चारों कोणोंपर स्थित देवताओंकी पूजा करे। यथा—ईशानकोणमें आप (जल), अग्निकोणमें सावित्री, नैर्ऋत्यकोणमें जय और वायुकोणमें रुद्रदेवकी पूजा करे। नवपद परिमापके मध्यमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये और उनके समीप ही अन्य आठ देवताओंका भी पूजन करे। पूर्वादिक क्रमसे उन पूजनीय देवोंके नाम इस प्रकार हैं—
अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर और अपवत्स—ये आठ देव हैं, जो ब्रह्माके चारों ओर मण्डलाकार स्थित हैं।
दुर्गनिर्माणमें ईशानकोणसे नैर्ऋत्यकोणपर्यन्त सूत्रद्वारा किया गया रेखाङ्कन वंश कहा जाता है और अग्निकोणसे जब वायुकोणपर्यन्त दूसरी रेखा खींची जाती है तो वह वंश-रेखा, दुर्धर-रेखा कहलाती है। वंश-रेखापर ईशानकोणमें अदिति, दुर्धरयोग विन्दुपर हिमवन्त, नैर्ऋत्यकोण अर्थात् वास्तुमण्डलके अन्तिम नैर्ऋत्य विन्दुपर जयन्तके पूजनका विधान है। तत्पश्चात् दुर्धर-रेखाके प्रारम्भमें अग्निकोणपर नायिका तथा अन्तिम छोर वायुकोणपर कालिकादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर शुक्र अर्थात् इन्द्रसे लेकर गन्धर्वपर्यन्त उक्त वास्तुदेवोंकी पूजा करके भवन-निर्माणका कार्य प्रारम्भ करना चाहिये।
वास्तु (भवन)-के सम्मुख-भागमें देवालय, अग्निकोणमें पाकशाला, पूर्व दिशामें यज्ञ-मण्डप, ईशानकोणमें काष्ठ या प्रस्तरसे बनी पट्टिकाओंके द्वारा घिरा हुआ सुगन्धित पदार्थों तथा पुष्पोंको रखनेका स्थान, उत्तर दिशामें भाण्डारागार, वायुकोणमें गोशाला, पश्चिम दिशामें खिड़की तथा जलाशय, नैर्ऋत्यकोणमें समिधा, कुश, ईंधन तथा अस्त्र-शस्त्रका कक्ष, दक्षिण दिशामें सुन्दर शय्या, आसन, पादुका, जल, अग्नि, दीप और सज्जन भृत्योंसे युक्त अतिथिगृहका निर्माण करना चाहिये।
गृहके बीच समस्त रिक्तभागमें कूप, जलसिंचित कदलीगृह और पाँच प्रकारके पुष्पपादपोंको सुनियोजित करे। भवनके बाह्य भागमें चारों ओर पाँच हाथ ऊँची दीवाल बनाकर वन और उपवनसे आच्छादित भगवान् विष्णुका मन्दिर बनाना चाहिये।
इस मन्दिरके निर्माणकार्यके प्रारम्भमें चौंसठ पदका वास्तुमण्डल बनाकर वास्तुदेवताकी विधिवत् पूजा करे। उक्त रीतिके अनुसार वास्तुमण्डलके मध्य भागमें चार पदके मण्डलान्तर्गत ब्रह्मा तथा उनके समीपस्थ प्रत्येक दो पदपर अर्यमादि आठ देवोंकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर कर्णभागपर कार्तिकेय आदिका पूजन करके, दोनों ओर पार्श्व विन्दुओंपर दो-दो पदोंकी दूरीसे स्थित अन्य पार्श्व देवोंका पूजन करे। तत्पश्चात् वास्तुमण्डलके ईशानादि कोणोंपर क्रमशः चरकी, विदारी, पूतना और पापराक्षसी नामक देवशक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद
* मूलपाठमें 'द्वाविंशति' पाठ है, वास्तवमें द्वात्रिंशत् पाठ होना चाहिये।