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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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७६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १ होते हैं--यह पवन [ के समान पुरुष ] को वह कहता है । ( सः सद्यः पूर्वस्मात् उत्तरं समुद्रम् एति [ अथ० ११ । ५ । ६ पाद ३ ]--इति आदित्यम् आह ) वह अभी पहिले [ समुद्र अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम ] से अगले समुद्र [ गृहाश्रम ] को प्राप्त होता है--यह आदित्य [ सूर्य समान ब्रह्मचारी ] को वह कहता है । ( दीक्षितः दीर्घश्मश्रुः [ अथ० ११ । ५ । ६ । पाद २ ]--एषः दीक्षितः एषः दीर्घश्मश्रुः, एषः एव आचार्य्यस्थाने तिष्ठन् आचार्य्यः इति स्तूयते ), वह दीक्षा पाये हुये [ नियम व्रत करता हुआ ] बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछ वाला है--यह दीक्षा पाये हुये, यह बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछ वाला, यही [ ब्रह्मचारी ] आचार्य के पद पर ठहरा हुआ, यह आचार्य है -ऐसा स्तुति किया जाता है, ( वैद्युतस्थाने तिष्ठन् वायुः इति स्तूयते ) विजुली के स्थान [ अति वेग ] में ठहरा हुआ वह वायु [ पवन के समान शीघ्रगामी ] है--ऐसा स्तुति किया जाता है ( द्यौः स्थाने तिष्ठन् आदित्यः इति स्तूयते ) प्रकाश के स्थान [ ज्ञान के प्रकाश ] में ठहरा हुआ वह आदित्य [ सूर्य समान तेजस्वी ] है--ऐसा स्तुति किया जाता है । ( तत् अपि एतत् ऋचा उक्तम् - ब्रह्मचारी इष्णन् [ अथ० ११ । ५ । १ पाद १ ]--इति ब्राह्मणम् , यह भी इस ऋचा करके कहा गया है--ब्रह्मचारी लगातार खोजता हुआ--यह ब्राह्मण है ॥ भावार्थः-ब्रह्मचारी वेदाध्ययन और इन्द्रिय दमनरूप तपोबल से सब सूर्य, पृथिवी आदि स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों को जानकर और उनसे उपकार लेकर संसार को सुखी करता है ॥ १ ॥ विशेषः १- प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं । १- ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसी उभे तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति । स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं तपसा पिपर्ति ॥ अथ० ११ । ५ । १ । ( ब्रह्मचारी ) ब्रह्मचारी [ वेदपाठो और वीर्य्यनिग्रही पुरुष ] ( उभे ) दोनों ( रोदसी ) सूर्य और पृथिवी को ( इष्णन् ) लगातार खोजता हुआ ( चरति ) विचरता है, ( तस्मिन् ) उस [ ब्रह्मचारी ] में ( देवाः ) विजय चाहने वाले पुरुष ( संमनसः ) एक १--(ब्रह्मचारी) ब्रह्म+चर गतीभक्षणयोः--णिनिः । ब्रह्मणे वेदाय वीर्य्यनिग्रहाय च चरणशीलः पुरुषः ( इष्णन् ) इष आभीक्ष्ण्ये--शतृः । पुनः पुनरन्विच्छन् ( चरति ) विचरति । प्रवर्त्तते ( रोदसी ) द्यावापृथिव्यौ ( आह ) ईश्वरो ब्रवीति । ( देवाः ) विजिगीषवः ( सम्मनसः ) समानमनस्काः ( वायुम् ) वायुतुल्यस्वभावयुक्तम् ( सद्यः ) तत्क्षणम् ( पूर्वस्मात् ) प्रथमसमुद्ररूपाद् ब्रह्मचर्या- श्रमात् ( उत्तरम् ) अनन्तरम् ( समुद्रम् ) गृहाश्रमरूपं समुद्रम् ( आदित्यम् ) सूर्य- तुल्यतेजस्विनम् ( दीक्षितः ) प्राप्तदीक्षः । धृतनियमः ( दीर्घश्मश्रुः ) लम्बमान- मुखस्थलोमा (वैद्युतस्थाने) वायुतुल्यवेगस्थाने ( द्यौः स्थाने ) द्युस्थाने । ज्ञानप्रकाश- पदे ( स्तूयते ) प्रशस्यते ॥