BharatKosha
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 172 of 600

Read in context
Page 172

१३४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १ ॥ हैं। (नान्यः १ अभृग्वङ्गिरोवित् वृतः यज्ञम् आगच्छेत् यज्ञस्य तेजसा तेजः आप्नोति, ऊर्जया ऊर्जा, यशसा यशः न अन्यः) अन्य कोई चारों वेद न जानने वाला चुना हुआ पुरुष यज्ञ में न आवे [क्योंकि वेदज्ञ ही] यज्ञ के तेज से तेज, बल से बल, यश से यश पाता है, और दूसरा नहीं। (अभृग्वङ्गिरोवित् अवृतः यज्ञम् आगच्छेत्, यज्ञं नेत् परिमुष्णीयात् इति) चारों वेद न जानने वाला बिना चुना हुआ पुरुष यज्ञ में [यदि] आवे [तो] वह यज्ञ को कभी न चुरावे [अर्थात् पदाधिकारी न बनाया जावे] (तत् यथा वत्सः पूर्वम् अधीत्य गां धयेत् एवं ब्रह्मा भृग्वङ्गिरोवित् वृतः यज्ञम् आगच्छेत् यज्ञं नेत् परिमुष्णीयात् इति) सो जैसे बछड़ा [दोहने से] पहिले आकर गाय को पी लेवे, वैसे ही ब्रह्मा चारों वेद जानने वाला यज्ञ में आवे वह कभी यज्ञ को न चुरावे [अपनी ही स्वार्थ सिद्धि न करे]। (तत्-यथा गौः वा, अश्वः वा, अश्वतरः वा एकपात् द्विपात् त्रिपात् इति स्यात् किम् अभिवहेत् किम् अभ्यश्नु- यात् इति) सो जैसे बैल, वा घोड़ा वा खच्चर एक पांव वाला, दो पांव वाला, वा तीन पांव वाला होवे, वह क्या ले जावेगा और किस स्थान पर पहुंचेगा [अल्प शक्ति वाला होने से]। (तस्मात् ऋग्विद्म् एव होतारं वृणीष्व, यजुर्विदम् अध्वर्युं, सामविदम् उद्गातारम्, अथर्वाङ्गिरोविदं ब्रह्माणम्) इसलिये ऋग्वेद जानने वाले को ही होता चुन, यजुर्वेद जानने वाले को अध्वर्यु, सामवेद जानने वाले को उद्गाता और अथर्वाङ्गिरा [चारों वेद] जानने वाले को ब्रह्मा। (तथा ह अस्य यज्ञः चतुर्षु लोकेषु चतुर्षु देवेषु चतुर्षु वेदेषु चतसृषु होत्रासु चतुष्पात् यज्ञः प्रतिष्ठति) उस प्रकार से ही इस [यजमान] का यज्ञ चार लोकों में, चार देवों में, चार वेदों में, चार ऋत्विजं की क्रियाओं में ठहरता है [देखो गो० पू० २। १६ और २४]। (प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति यः एवं वेद, यः च एवम् ऋत्विजाम् आर्त्विज्यं वेद यः च यज्ञे यजनीयं वेद इति ब्राह्मणम्) वह प्रजा से और पशुओं से प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा जानता है और जो ऋत्विजों के ऋत्विज् कर्म को जानता है और जो यज्ञ में पूजनीय व्यवहार जानता है, यह ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञान] है ॥ १ ॥ भावार्थः-वेदवेत्ता यज्ञकुशल पुरुष ही आदरणीय होवें ॥ १ ॥ वायुसूर्यादिदिव्यपदार्थान् (आह) कर्मण्यर्थे । कथ्यते (अभिवादः) अर्श- आद्यच् । प्रणामयोग्यः (उत्तरम्) उन्नततरम् (गृणानान्) कर्मण्यर्थे । प्रियमा- णान् । स्तूयमानान् (तान्) वेदान् (वृणानान्) कर्मण्यर्थे । व्रियमाणान् । स्वीकरणीयान् (ह्वयन्तः) आह्वयन्तः । उच्चारयन्तः (मन्यन्ते) ज्ञायन्ते (अन्यः) भिन्नः (वृतः) स्वीकृतः (ऊर्जया) पराक्रमेण (अवृतः) अस्वीकृतः (नेत्) नैव (परिमुष्णीयात्) अपहरेत् । नाशयेत् (पूर्वम्) दोहनात् पूर्वम् (वत्सः) गोशिशुः (अधीत्य) आगत्य (धयेत्) धेट् पाने । पिबेत् (अभ्यश्नुयात्) प्राप्नुयात् ॥ १. यहाँ आगे कण्डिका की पङ्क्तियां अति भ्रष्ट थीं, हस्तलेखों से मिलान करके मूल एवं अर्थ भी यथावश्यक ठीक किया है ॥ सम्पा० ॥