गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context१४८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० ६ ॥ अपरम् इव श्मश्रूणि उपकक्ष्याणि अन्यानि लोमानि जायन्ते २ ) जो कि पीछे से प्रस्तर [ कुशा का मुठ्ठा ] विछाता है, इसलिये पीछे से इनके दाढ़ी मूंछ और कांख के और दूसरे लोम उत्पन्न होते हैं २ । ( यत् प्राक् बर्हिषः प्रस्तरम् अनुप्रहरति तस्मात् इमाः प्रजाः शिरस्तः प्रथमं पलिताः भवन्ति ३ ) जो पूर्व दिशा में कुशा के मुट्ठे को समेट लेता है, इसलिये यह प्रजायें शिर पर पहिले श्वेत हो जाते हैं । ३ ( यत् अन्ततः सर्वम् एव अनुप्रहरति तस्मात् अन्ततः सर्वे एव पलिताः भवन्ति ४ ) जो कि अन्त में सबको ही समेट लेता है इसलिये अन्त में सभी श्वेत हो जाते हैं ४ । ( यत् प्रयाजाः अपुरोऽनुवाक्यावन्तः भवन्ति तस्मात् इमाः प्रजाः अदन्तिकाः जायन्ते ५ ) जो कि प्रयाज [ यज्ञाङ्ग विशेष ] पुरोऽनुवाक्या बिना होते हैं, इसलिये यह प्रजायें बिना दांत वाले होते हैं ५ । ( यत् हवींषि पुरोऽनुवाक्यावन्ति भवन्ति तस्मात् आसाम् अपरम् इव जायन्ते ६ ) जो कि हवि पुरोऽनुवाक्या वाले होते हैं, इसलिये इनके [ दान्त ] पीछे निकलते हैं ६ । ( यत् अनुयाजाः अपुगोऽनुवाक्यावन्तः भवन्ति तस्मात् आसाम् सप्तवर्षाष्टवर्षाणां प्रभिद्यन्ते ७ ) जो कि अनुयाज [ यज्ञाङ्गविशेष ] पुरोऽनुवाक्या बिना होते हैं, इसलिये सात वर्ष आठ वर्ष वालों के [ दाँत ] उखड़ जाते हैं ७ । ( यत् पत्नीसंयाजाः पुरोऽनुवाक्यावन्तः भवन्ति तस्मात् आसाम् पुनः एव जायन्ते ८ ) जो कि देवपत्नियों के यज्ञ पुरोऽनुवाक्या वाले होते हैं, इसलिये इनके [ दांत ] फिर भी निकल आते हैं ८ । ( यत् समिष्टयजुः अपुरोऽनुवाक्यावत् भवति तस्मात् अन्ततः सर्वे एव प्रभिद्यन्ते ६ ) जो कि समिष्टयजु [ यज्ञविशेष ] पुरोऽनुवाक्या बिना होता है, इसलिये अन्त में सब ही [ दांत ] उखड़ जाते हैं ६ । ( यत् अनूच्य गायत्र्या त्रिष्टुभा यजति तस्मात् अधरे दन्ताः पूर्वं जायन्ते १० परे उत्तरे ११ ) जो कि [ मन्त्रों को ] पढ़कर गायत्री के साथ और त्रिष्टुप के साथ यज्ञ करता है, इसलिये नीचे वाले दांत पहिले निकलते हैं १०, और पीछे ऊपर वाले ११ । ( यत् अनूच्य ऋचा यजुषा यजति तस्मात् अधरे दन्ताः अणीयांसः, ह्रसीयांसः १२, उत्तरे प्रथीयांसः वर्षीयांसः १३ ) जो कि [ मन्त्रों को ] पढ़कर ऋग्वेद के साथ और यजुर्वेद के साथ यज्ञ करता है, इसलिये नीचे वाले दांत अधिक सूक्ष्म और निर्बल होते हैं १२, और ऊपर वाले अधिक चौड़े और सबल होते हैं १३ । ( यत् दीर्घतरौ प्राञ्चौ आघारौ आघारयति तस्मात् इमौ दंष्ट्रौ दीर्घतरौ १४ ) जो कि अधिक लम्बे और अधिक पूजनीय दोनों आवार [ घृतदान के होमविशेष ] को सींचता है, इसलिये यह [ सामने के ] दोनों बड़े दांत अधिक लम्बे होते हैं १४ । ( यत् संयाज्ये सञ्छन्दसी तस्मात् समे इव जम्भे १५ ) जो कि दोनों संयाज्य समान छन्द वाले होते हैं, इसलिये दोनों दाढें चौकोर सी हैं १५ । ( यत् चतुर्थे ६—(स्तृणाति ) आच्छादयति ( लोमशः ) लोमवन्तः ( प्रस्तरम् ) दर्भ- मुष्टिम् ( अनुप्रहरति ) संगृह्णाति ( पत्नीसंयाजाः ) देवपत्नीनां स्तुतियुक्त- यज्ञाङ्गविशेषाः । देवपत्न्यः यथा इन्द्राणी, अग्नायी, वरुणानी, इत्यादय. ( आघारौ ) आ+घृ क्षरणे—घञ् । घृतदानहोमविशेषौ ( प्राञ्चौ ) प्रकर्षेण पूजनीयौ ( आघारयति ) समन्तात् सिञ्चति ( सामिधेनी ) समिधामाधाने ष्ण्यण् ( वा० पा० ४ । ३ । १२० ) समिध्—ष्ण्यण्, षित्वात् ङीष्, यलोपः । अग्निप्रज्वलने