गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
DevanagariSanskritpublished600 pages
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१६८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १८ षट्त्रिंशदक्षरा बृहती, बार्हतं वै स्वर्गो लोकः बृहत्या वै देवाः स्वर्गो लोके यजन्ते, बृहत्या स्वर्गे लोके प्रतितिष्ठन्ति, प्रतिनिष्ठन्ति प्रजया पशुभिर्य एवं विभ- जन्ते । अथ यदतोऽन्यथाशीलको वा पापकृतो वा हुतादो वाऽन्यजना वाऽपि मथ्नीरन्नेवमेवैषां पशुविमथितो भवतयस्वर्ग्यो१देवता यो ह वा इमं२ श्रुतऋषिः पशो- विभागं विदाञ्चकार, तामु ह गिरिजाय बाभ्रव्यायान्त्यो मनुष्येभ्यः प्रोवाच, ततोऽ ३यमर्वाङ् मनुष्येष्व्वासीदिति ब्राह्मणम् ॥ १८ ॥ कण्डिका १८ ॥ पशुरूप वेदवाणी की सूक्ष्मता का विचार ॥ (अथ अतः सवनीयस्य पशोः अवदानानि उद्धृत्य विभागं व्याख्या- स्यामः) अब यहां यज्ञ योग्य पशु के खण्डों को निकाल कर विभाग की हम व्याख्या करेंगे। (सजिह्वे हनू प्रस्तोतुः) जिह्वा सहित दोनों जबड़े प्रस्तोता [ऋत्विज्] के हैं १, (सकाकुदः कण्ठः प्रतिहर्तुः) तालु सहित कण्ठ प्रतिहर्ता का है २, (श्येनं वक्षः उद्गातुः) श्येन पक्षी के आकार वाली छाती उद्गाता की है ३, (सांसं दक्षिणं पार्श्वम् अध्वर्योः) कन्धे सहित दाहिना पांजर अध्वर्यु का है ४, (सव्यम् उप- ग.तृणाम्) बांयां [पांजर] उपगाताओं का है ५, (सव्यः अंसः प्रतिप्रस्थातुः) बांयां कन्धा प्रतिप्रस्थाता का है ६, (दक्षिणा श्रोणिः अध्यास्त्री ब्रह्मणः) दाहिना कूला अध्यास्त्री [??] ब्रह्मा का है ७, (अवरसक्थं ब्राह्मणाच्छंसिनः) [दाहिनी] नीचे वाली पिंडली ब्राह्मणाच्छंसी की है ८, (ऊरुः पोतुः) जांघ पोता [ऋत्विज्] की है ६, (सव्या श्रोणिः होतुः) बांयां कूला होता का है १०, (अवरसक्थं मैत्रा- वरुणस्य) [बायीं] नीचे वाली पिंडली मैत्रावरुण [प्राण और अपान वायु के जानने वाले ऋत्विज्] की है ११, (ऊरुः अच्छावाकस्य) [बायीं] जांघ अच्छावाक की है १२, (दक्षिणा दोः नेष्टुः) दाहिना भुजदण्ड नेष्टा का है १३, (सव्या सदस्यस्य) बांयां [भुजदण्ड] सदस्य का है १४, (सदं च अनूकं च गृहपतेः) पीठ का बांस [रीढ़] और मूत्र की थैली गृहपति की है १५, १६ (जाघनी पत्न्याः तां सा ब्राह्मणेन प्रतिग्राहयति) पूंछ पत्नी की है, उसको वह ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञानी] से स्वीकार कराती है १७, (वनिष्ठुः हृदयं वृक्कौ च आङ्गुल्यानि दक्षिणः बाहुः आग्नीध्रस्य) वनिष्ठु [भीतरली मल की मोटी आंत], हृदय, दो अण्डकोश, अंगुलियों के जोड़ और दाहिनी भुजा आग्नीध्र की है १८, १६, २०, २१, २२, (सव्यः आत्रेयस्य) बायीं [भुजा] आत्रेय
१८-(सवनीयस्य) यज्ञीयस्य (उद्धृत्य) उत्+हृञ् हरणे-ल्यप् । उत्क्षिप्य (अवदानानि) खण्डनानि (श्येनम्) श्येनाकारम् (वक्षः) पचिवचिभ्यां सुट् च (उ० ४।२२०) वच व्यक्तायां वाचि-असुन्, सुट् च । उरः (पार्श्वम्) स्पृशेः श्वण्शुनौ पृ च (उ० ५।२७) स्पृश संस्पर्शने-श्वण् पृ इत्यादेशः । कक्षाधोभागः (श्रोणिः) वहिश्रिश्रुयुद्रु० (उ० ४।५१) श्रु गतौ श्रुतौ च-निः। कटेः पश्चाद्- भागः । नितम्बः । (अध्यास्त्री) ?? (अवरसक्थम्) असिसञ्जिभ्यां क्थिन्
१. पू० सं० 'स्वर्गो' इति पाठः ॥ २. पू० सं० "इमां, इयम्" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥