BharatKosha
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 378 of 600

Read in context
Page 378

३४० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १४

असि १४) तू बस्तियों में व्यापक है, (वेषश्रीः असि १५ इति प्रतिष्ठितिरेव १) तू व्याप्त पदार्थों में शोभा देने वाला है—इससे [मनुष्य का] प्रतिष्ठापक है ।। (आक्रमः असि १६) [हे परमात्मन् !] तू चढ़ाई करने वाला है, (सङ्क्रमः असि १७) तू संयोग करने वाला है, (उत्क्रमः असि १८) तू ऊंचा चढ़ने वाला है, (उत्क्रान्तिः असि १९ इति ऋद्धिः एव) तू ऊपर को डग मारने वाला है [देखो यजु० १५ । ६], इससे [मनुष्य को] ऋद्धि [संपत्ति] होती है। (यत् यत् वै सविता देवेभ्यः प्रासुवत्, तेन आध्नुवन् सवितृप्रसूताः एव स्तुवन्ति ऋध्नुवन्ति) जो जो ही सविता [सर्वजनक परमात्मा] ने विद्वानों के लिये प्रेरणा की है, उससे वे बढ़े हैं, परमात्मा से प्रेरणा किये हुये ही वे स्तुति करते हैं, बढ़ते हुये रहते हैं [देखो क० १०] १। (बृहस्पतये स्तुत इति, बृहस्पतिः वै देवानाम् आङ्गिरसः ब्रह्मा) बृहस्पति [बड़ी वेदवाणियों के पालन करने वाले विद्वान्] के लिये तुम स्तुति करो—बृहस्पति ही विद्वानों में वेद जानने वाला ब्रह्मा है। (तत् अनुमत्या एव ओम् भूः जनत् इति प्रातःसवने ऋग्भिः एव उभयतः अथर्वाङ्गिरोभिः गुप्ताभिः गुप्तैः स्तुत इति एव) उस ब्रह्मा की अनुमति से—ओं भूः जनत् [यह व्याहृति है]—प्रातःसवन यज्ञ में ऋग् मन्त्रों द्वारा ही दोनों ओर से [आदि और अन्त में] निश्चल ब्रह्म के ज्ञानों से रक्षा की हुयी [व्याहृतियों] से रक्षा किये हुये [स्तोमों] द्वारा तुम स्तुति ही करो। (ओं भुवः जनत् इति, माध्यन्दिने सवने यजुर्भिः एव उभयतः अथर्वाङ्गिरोभिः गुप्ताभिः गुप्तैः स्तुत इति एव) ओं भुवः जनत् [यह व्याहृति है] माध्यन्दिन सवन में यजुर्मन्त्रों द्वारा ही दोनों ओर से [आदि और अन्त में] निश्चल ब्रह्म के ज्ञानों से रक्षा की हुई [व्याहृतियों] से रक्षा किये हुये [स्तोमों] द्वारा, तुम स्तुति ही करो। (ओं स्वः जनत् इति, तृतीयसवने सामभिः एव उभयतः अथर्वाङ्गिरोभिः गुप्ताभिः गुप्तैः स्तुत इति एव) ओं स्वः जनत् [यह व्याहृति है]—तृतीयसवन में साममन्त्रों द्वारा ही दोनों ओर से [आदि और अन्त में] निश्चल ब्रह्म के ज्ञानों से रक्षा की हुई [व्याहृतियों] से रक्षा किये हुये [स्तोमों] द्वारा, तुम स्तुति ही करो। (अथ यदि अहीनः उक्थ्यः षोडशी वाजपेयः अतिरात्रः अप्तोर्यामः वा स्यात्, अतः ऊर्ध्वं सर्वाभिः सर्वाभिः व्याहृतिभिः अनुजानाति) फिर जो अहीन, [गो० उ० २।८]

(वस्यष्टिः) खनिकष्यज्यसिवसि० (उ० ४। १४०) वस निवासे—इप्रत्ययः । अशूङ् व्याप्तौ संघाते च—तिप्रत्ययः । वसि—अष्टिः । वसिषु वस्तिषु व्यापकः (वेषश्रीः) विष्ळृ व्याप्तौ—घञ् +श्रीः । वेषाणां श्रीः यस्मात् सः । व्याप्तपदार्थशोभाप्रदः (आक्रमः) आ+क्रमु पादविक्षेपे घञ् । आक्रमकः । (सङ्क्रमः) संयोजकः (उत्क्रमः) ऊर्ध्वं गन्ता (उत्क्रान्तिः) ऊर्ध्वं पादविक्षेपणशीलः (अथर्वाङ्गिरोभिः) निश्चलज्ञानैः ('उभयतः) आद्यन्तयोः (गुप्ताभिः) रक्षिताभिः, व्याहृतिभिः (गुप्तैः) रक्षितैः, स्तोमैः (अप्तोः) गो० पू० ५। २३ । प्राप्तायाः प्रजायाः (यामः)

१. इससे आगे १३ वीं कण्डिका का कुछ पाठ लेखक प्रमाद से यहाँ आ गया था, जिसे हमने पृ० ३३८ टि० १ में दिखा दिया है। पाठक इस अंश का अर्थ यथास्थित १३ वीं कण्डिका पृ० ३३६ की टि० १ में देख लें ॥ सम्पा० ॥