गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
Page 484 of 600
Read in context४४६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७ गिर्वणः...... ३-यह दो मन्त्र अच्छावाक के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। (ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्परि...... इति उक्थमुखम्) ऋतुः जनित्री तस्याः अपः परि......४-यह मन्त्र [अच्छावाक का] उक्थमुख है। (तस्य उक्तं ब्राह्मणम्) उसका ब्राह्मण कहा गया है। (नु मर्त्तो दयते सनिष्यन्...... इति वैष्णवं सांशंसिकम्) नु मर्त्तः दयते सनिष्यन्...... ५--यह मन्त्र विष्णु देवता वाला सांशंसिक [यथार्थ प्रशंसा युक्त उक्थ] है। (अहं च इति विष्णुः अब्रवीत्, देवतयोः संशंसनाय अनतिशंसनाय) और मैं-यह विष्णु ने कहा [क० ११], वह देवताओं की यथार्थ प्रशंसा के लिये है जो अत्युक्ति बिना प्रशंसा हो। (सं वां कर्मणा समिषा हिनोमि......, इति ऐन्द्रावैष्णवे पर्य्यासः) सं वां कर्मणा......६-यह मन्त्र इन्द्र और विष्णु वाले [उक्थ] में पर्यास [अन्त] है। (अस्य ऐन्द्रावैष्णवम् एतत् नित्यम् उक्थम्) इस [अच्छावाक] का इन्द्र और विष्णु देवता वाला यह नित्य उक्थ है। (तत् एतत् स्वस्मिन् आयतने स्वस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठापयति) सो यह [उक्थ] अपने स्थान में और अपनी प्रतिष्ठा में [यजमान को] स्थापित करता है। (एताः देवताः द्वन्द्वं वै भूत्वा विजित्यै एव व्यजयन्त) इन सब देवताओं ने दो दो होकर विजय के लिये ही विजय पाया है। (अथो द्वन्द्वस्य एव मिथुनस्य प्रजात्यै) फिर दो दो [देवता] वाले ही मिथुन [ज्ञान वा जोड़ा] की उत्पत्ति के लिये है। (उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे ...इति ऐन्द्रावैष्णव्या ऋचा परिदधाति) उभा जिग्यथुः न...... ७-इस इन्द्र और विष्णु वाली ऋचा से वह परिधानीया इष्टि करता है। (इन्द्राविष्णोः एव यज्ञं प्रतिष्ठापयति) इन्द्र और विष्णु के यज्ञ को वह स्थापित करता है। (इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य ...इति यजति) इन्द्रा- विष्णू पिबतम् ...८--इस मन्त्र से वह याज्या आहुति देता है। (एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्य अनुवषट्करोति) इन ही दो देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [अन्तिम आहुति दान] करता है। (प्रत्ति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति) वे [ऋषि लोग] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं-नरों [नेताओं] की स्तुति जनयित्री। जननी (अपः) जलानि (परि) सर्वतः (नु) शीघ्रम् (मर्त्तः) मनुष्यः (दयते) धनमादत्ते (सनिष्यन्) सर्वधातुभ्यः इन् (उ० ४।११८) षणु दाने--इन्। सुप आत्मनः क्यच् (पा० ३।१।८) सनि--क्यच् लालसायां सुगागमः, ततः शतृ ।१ दातव्यधनमिच्छन् (सम्) सम्यक् (वाम्) युवाम् (कर्मणा) ईप्सिततमेन व्यापारेण (इषा) अन्नेन (हिनोमि) वर्धयामि (उभा) उभौ। इन्द्राविष्णू (जिग्यथुः) लिटि रूपम्। युवां जितवन्तौ शत्रून् (न) निषेधे (पराजयेथे) पराजयं प्राप्नुथः (मध्वः) मधुरस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥ १. रूपसिद्धि की प्रक्रिया के इतने लम्बे व्यायाम की अपेक्षा लृडन्त सन् धातु से 'लुटः सद्वा' के नियम के अनुसार शतृ प्रत्यय होकर प्रथमा के एकवचन में 'सनिष्यन्' बनाना अधिक श्रेयस्कर है ॥ सम्पा० ॥