गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ क० २ ॥ ४९७ अच्छावाक दिन दिन बोलता है । (अभिवदति तत्त्यै रूपम्, अभिप्रीयाणि मर्मृशत् पराणि, इति यानि एव पराणि अहानि, तानि प्रियाणि तानि एव तत् अभिमर्मृशन्तः अभ्यारभमाणाः यन्ति) अभि, [सब ओर], शब्द वाला [पहिला पाद] वह बोलता है, वह विस्तार के लिये रूप है, अभिप्रीयाणि मर्मृशत् पराणि [यह उसी मन्त्र का तीसरा पाद है], जो ही श्रेष्ठ दिन हैं, वे ही प्रिय हैं, उनको ही तब सब ओर से विचारते हुये और आरम्भ करते हुये लोग चलते हैं । (अस्मात् लोकात् परः वै स्वर्गः लोकः तं स्वर्गम् एव लोकम् अभिमृशन्ति) इस [साम्राज्य] लोक से श्रेष्ठ ही स्वर्ग लोक है, उस स्वर्ग लोक को ही वे छूते हैं [पाते हैं] (कवीँरिच्छामि सन्दृशे सुमेधाः इति ये ह वै पूर्वे अनेन प्रीताः ते वै कवयः, तान् एव तत् अभ्यभिवदति) कवीँरिच्छामि सन्दृशे सुमेधाः [यह उस मन्त्र का चौथा पाद है] जो ही पहिले ऋषि इस [सूक्त भाग] से प्रसन्न हुये हैं, वे ही कवि [महाज्ञानी] हैं उनको ही इस [पाद से] वह प्रणाम करता है । (यत् उ वै दशर्चम्, दश वै प्राणाः, प्राणान् एव तत् प्राणानां सन्तत्यै आप्नोति) जो वह दश ऋचा वाला सूक्त है, दश ही प्राण [पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रिय] हैं, प्राणों को ही तब प्राणों के फैलाव के लिये वह पाता है । (यत् उ वै दशर्चम् दश वै पुरुषे प्राणाः, दश स्वर्गाः लोकाः, तत् प्राणान् च एव स्वर्गान् लोकान् च आप्नोति) जो यह दस ऋचा वाला सूक्त है, और दस ही पुरुष में प्राण हैं, [दस इन्द्रियों की स्वस्थता से] दस स्वर्ग लोक है, उससे ही प्राणों और स्वर्ग लोकों [इन्द्रियों की स्वस्थ गोलकों] को वह पाता है । (एतत् प्राणेषु च एव स्वर्गेषु च लोकेषु प्रति- तिष्ठन्तः यन्ति) इससे ही प्राणों और स्वर्ग लोकों में दृढ़ ठहरे हुये वह चलते हैं । (यत् उ वै दशर्चम्, दशाक्षरा विराट्, इयं वै विराट् इयं वै स्वर्गस्य लोकस्य प्रतिष्ठा, तत् एतत् अस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठापयति) जो ही यह [सूक्त] दश ऋचा वाला है, दश अक्षर वाला विराट् छन्द है, यह [पृथिवी] ही विराट् [विविध ऐश्वर्य वाली] है, यह [पृथिवी] ही स्वर्ग लोक की प्रतिष्ठा [दृढ़ स्थिति] है, सो यह इस प्रतिष्ठा में [यजमान को] प्रतिष्ठित करता है । (सकृत् इन्द्रं निराह, तेन ऐन्द्रात् रूपात् न प्रच्यवते) एक बार इन्द्र को वह बोलता है, इसलिये इन्द्र वाले रूप [ऐश्वर्य] से नहीं गिरता है । (तत् सम्पातानाम् उपरिष्टात् अहरहः शंसति) इसलिये सम्पात सूक्तों के उपरान्त [इस सूक्त को] दिन दिन वह बोलता है ॥ २ ॥ भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ २ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । १६ और ६ । २० से मिलाओ ॥ विशेषः २—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—को अद्य नर्यो देवकाम उशन्निन्द्रस्य सख्यं जुजोष । को वा महेऽवसे पार्याय समिद्धे अग्नौ सुतसोम ईट्टे—ऋ० ४ । २५ । १–८ वामदेव ऋषि ॥ सन्तत्यै (अभिमर्मृशन्तः) अभितः पुनः स्पृशन्तः, विचारयन्तः, (अभ्यभिवदति) अभि अभि इति शब्दद्वययुक्तं सूक्तं ब्रूते । अभितो अभिवादनं नमस्करोति (सकृत्) एकवारम् (ऐन्द्रात्) इन्द्रसम्बन्धिनः सकाशात् ॥ ३२