गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २५ ॥ ४३ का पुत्र [ नरक से बचाने वाला सन्तान ] है--२, ( किञ्च एतत् छन्दः ) और यह क्या छन्द है [ आनन्ददायक कर्म वा गायत्री आदि छन्द ]--३, ( किं च एतत् वर्णं . ] और यह क्या रङ्ग है-४, ( किं च एतत् ब्रह्म ब्रह्मा सम्पद्यते ) और कौन से इस ब्रह्म को ब्रह्मा [ सब वेदों का जानने वाला ] प्राप्त करता है, ( तस्मात् वै तत् भद्रम् ओङ्कारं पूर्वम् आलेभे ) और उससे ही वह [ ब्रह्मा ] उस मंगलकारी ओङ्कार को पहिले पाता है--५ । [ यहाँ शंका होती है ]-( स्वरितोदात्तः एकाक्षरः ओंकारः ऋग्वेदे ) स्वरित और उदात्त स्वर वाला, एक अक्षर वाला, ओंकार ऋग्वेद में है । ( त्रैस्वर्योदात्तः एकाक्षरः ओंकारः यजुर्वेदे ) तीनों स्वर [ ह्रस्व दीर्घ प्लुत ] के सहित उदात्त एक अक्षर वाला ओंकार यजुर्वेद में है । ( दीर्घप्लुतोदात्तः एकाक्षरः ओंकारः सामवेदे ) दीर्घ- प्लुत के सहित उदात्त एक अक्षर वाला ओंकार सामवेद में है । ( ह्रस्वोदात्तः एकाक्षरः ओंकारः अथर्ववेदे ) ह्रस्व स्वर के साथ उदात्त एक अक्षर वाला ओंकार अथर्ववेद में है । ( उदात्तोदात्तद्विपदः अ उ इति अर्धचतस्रः मात्राः, मकारे व्यञ्जनम् इति आहुः ) उदात्त सहित उदात्त दो पद वाला अ उ यह साढ़े चार मात्रायें हैं और मकार में व्यञ्जन है, ऐसा कहते हैं । [ शंका समाधान ] ( या प्रथमा मात्रा सा ब्रह्मदेवतया वर्णेन रक्ता ) जो पहिली मात्रा है वह ब्रह्म देवता वाली रङ्ग से लाल है, ( यः तां नित्यं ध्यायते सः ब्राह्म्यं पदं गच्छेत् ) जो पुरुष नित्य उस [ मात्रा ] का ध्यान करे, वह ब्राह्म्य पद [ ब्रह्म के स्थान ] को प्राप्त हो । ( या द्वितीया मात्रा सा विष्णुदेवतया वर्णेन कृष्णा ) जो दूसरी स्वर मात्रा है वह विष्णु देवता वाली रङ्ग से काली है ( यः तां नित्यं ध्यायते सः वैष्णवं पदं गच्छेत् ) जो पुरुष उसका नित्य ध्यान करे वह वैष्णव पद [ विष्णु=सर्व- व्यापक परमात्मा के स्थान ] को पावे । ( या तृतीया मात्रा सा ऐशानदेवतया वर्णेन कपिला ) जो तीसरी स्वर मात्रा है वह ऐशान देवता वाली रङ्ग से पीली है, ( यः तां नित्यं ध्यायते सः ऐशानं पदं गच्छेत्) जो उस मात्रा का नित्य ध्यान करे, वह ऐशान पद [ ईशान सबके ईश्वर परमात्मा के स्थान ] को पावे । ( या अर्धचतुर्थी मात्रा, सा सर्वदेवतया व्यक्तीभूता खं विचरति वर्णेन शुद्धस्फटिकसन्निभा ) जो आधी के साथ चौथी [ डेढ़ ] स्वर मात्रा है वह सब देवताओं वाली प्रकाशमान होकर आकाश में विचरती है, रङ्ग से उज्ज्वल विल्लोरमणि के समान है, ( यः तां नित्यं ध्यायते स अनामकं पदं स्नातको भूत्वा ( त्रैस्वर्योदात्तः) त्रिस्वर-ष्यञ् । त्रिस्वरेण ह्रस्वदीर्घप्लुतेनोदात्तः । ( अर्धचतस्रः ) अर्धेन सह चतस्रः ( ध्यायते ) चिन्तयति ( गच्छेत् ) प्राप्नुयात् ( ब्राह्म्यम् ) ब्रह्मन्+ष्यञ् । ब्रह्मसम्बन्धि । ( अर्धचतुर्थी ) अर्धेन सह चतुर्थी ( व्यक्तीभूता ) प्रकाशमाना सती ( शुद्धस्फटिकसन्निभा ) उज्ज्वलस्फटिकमणिसदृशा ( अनामकम् ) नामशून्यम् ( उत्पत्तिः ) द्वितीयार्थे प्रथमा । उत्पत्तिम् ( उपनयनम् ) विद्यारम्भसंस्कारः ( ब्राह्मणवचनम् ) ब्रह्मवादिनः कथनम् ( लातव्यः ) ला