गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३३ ॥ ६१ स्थान और एक जोड़ा है । ५ । ( अहः एव सविता, रात्रिः सावित्री, ) दिन ही सविता है और रात्रि सावित्री है. ( यत्र हि एव अहः तत् रात्रिः यत्र वै रात्रिः तत् अहः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही दिन है वहां रात्रि है, जहां पर ही रात्रि है वहां दिन है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । ६ । ( उष्णम् एव सविता, शीतं सावित्री ) ताप ही चलाने वाला और ठण्ड चलाने वाले की सेवा करने वाली है, ( यत्र हि एव उष्णं तत् शीतम् यत्र वै शीतं तत् उष्णम् इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही ताप है वहां ठण्ड है, जहां पर ही ठण्ड है वहां ताप है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । ७ । ( अन्भ्रम् एव सविता वर्षम् सावित्री ) मेघ ही सविता और वर्षा स वित्री है, ( यत्र हि एव अभ्रम् तत् वर्षम् यत्र वै वर्ष तत् अब्भ्रम्, इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही मेघ है वहां वर्षा है, जहां पर ही वर्षा है वहां मेघ है यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । ८ । ( विद्युत् एव सविता स्तनयित्नुः सावित्री ) बिजुली ही चलाने वाला और गर्जन चलाने वाले की सेवा करने वाली है, ( यत्र हि एव विद्युत् तत् स्तनयित्नुः यत्र वै स्तनयित्नुः तत् विद्युत् इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही बिजुली है वहां गर्जन है. जहां पर ही गर्जन है वहां बिजुली है, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है । ९ । ( प्राणः एव सविता अन्नं सावित्री ) प्राण ही सविता है, अन्न सावित्री है ( यत्र हि एव प्राणः तत् अन्नं यत्र वै अन्नं तत् प्राणः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां ही प्राण है, वहां अन्न है, जहां ही अन्न है वहां प्राण है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । १० । ( वेदाः एव सविता छन्दांसि सावित्री ) सब वेद ही चलाने वाला है और छन्द [ आनन्दकारक कर्म वा गायत्री आदि छन्द ] चलाने वाले की सेवा करने वाली है, ( यत्र हि एव वेदाः तत् छन्दांसि, यत्र वै छन्दांसि तत् वेदाः इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही वेद हैं वहां छन्द हैं, जहां पर छन्द हैं वहां वेद हैं, यह दो उत्पत्तिस्थान और एक जोड़ा है । ११ । ( यज्ञः एव सविता दक्षिणाः सावित्री ) यज्ञ [ देवपूजा, सङ्गतिकरण और दान ] ही सविता है और दक्षिणायें सावित्री हैं, ( यत्र हि एव यज्ञः तत् दक्षिणाः, यत्र वै दक्षिणाः तत् यज्ञः, इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् ) जहां पर ही यज्ञ है वहां दक्षिणायें हैं, जहां पर ही दक्षिणायें हैं वहां यज्ञ है, यह दो उत्पत्ति स्थान और एक जोड़ा है । १२ । [ यह चौबीस उत्पत्ति स्थान और बारह जोड़ा हुये-देखो क० ३१ ] ( एतत् ह स्म एतत् ) यह बहुत प्रसिद्ध है-( विद्वांसम् ) अद् भक्षणे-क्तः । खाद्यपदार्थः ( छन्दांसि ) चन्देरादेश्च छः ( उ० ४ । २१६ ) चदि आह्लादने-असुन् चस्य छः । आनन्दप्रदानि कर्माणि । गायत्र्यादीनि वा । ( ओपाकारिम् ) आ + उप + अकारिम् । करोतेः लुङि रूपमार्षम् । अकार्षम् । आसमन्तात् उपकृतवानस्मि ( आसस्तुः ) सितनिगमिमसि० ( उ० १ । ६६ ) आङ् ईषदर्थे + षस स्वप्ने-तुन् । अल्पशयनः ( संस्थितः ) सम्यक् स्थितः ( एतः ) हिसमृगृण्वि० ( उ० ३ । ८६) इण् गतो-तुन् गतिशीलः । पुरुषार्थी । (आचितः)