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गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

by श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी)

DevanagariHindipublished647 pages

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वेदान्त-दर्शनम् — ब्रह्मसूत्र-गोविन्दभाष्यम्

प्रथमोध्यायः — प्रथमः पादः

द्वितीयाधिकरणम् (जन्माद्यधिकरणम् — उपसंहारः)

षड्विध-तात्पर्य-लिङ्ग-समन्वयः (श्रुति-सिद्धान्तः) [मूल संस्कृत भाष्यम्] उपसंहारोऽप्यन्यमीशमिति। अभ्यासश्च 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' तथा 'अन्यमीशं पश्यति' इति। अपूर्वता च श्रुत्येकगम्यः सर्वज्ञ-परमेश्वर-जीवयोर्भेदः। फलं च 'वीतशोकः' इति मोक्षप्राप्तिः। अर्थवादश्च 'महिमानमेति' इति भगवन्महिमानुभवः। उपपत्तिश्च 'अन्योऽनश्नन्' इति भोक्तृत्व-अभोक्तृत्व-वैलक्षण्यम्। अनेन श्रुत्यन्तरेण च परस्माद् ब्रह्मणो जीवस्य भेदः स्फुटः। [हिन्दी अनुवाद] यहाँ षड्विध तात्पर्य-लिङ्गों के द्वारा जीव और ब्रह्म का भेद स्पष्ट किया गया है: १. उपसंहार — श्रुति का उपसंहार 'अन्यमीशम्' (परमेश्वर अन्य हैं) पद से होता है। २. अभ्यास — 'तयोरन्यः' (उन दोनों में अन्य) तथा 'अन्यमीशम्' (अन्य परमेश्वर को देखता है) पदों का बारम्बार अभ्यास है। ३. अपूर्वता — केवल वेदों द्वारा ही ज्ञेय सर्वज्ञ ईश्वर तथा अल्पज्ञ जीव का नित्य भेद प्रतिपादित है। ४. फल — 'वीतशोकः' अर्थात् ईश्वर के साक्षात्कार से जीव का समस्त शोकों से मुक्त हो जाना ही फल है। ५. अर्थवाद — 'महिमानमेति' अर्थात् परमेश्वर के ऐश्वर्य एवं महिमा की स्तुति करना अर्थवाद है। ६. उपपत्ति — 'अन्योऽनश्नन्' अर्थात् कर्मफल-भोग से रहित साक्षी रूप में ईश्वर की सिद्धि होना उपपत्ति (तर्क) है। इस प्रकार इस श्रुति तथा अन्य वैदिक वचनों से परम पुरुषोत्तम भगवान् और जीवात्मा का स्पष्ट भेद सिद्ध होता है। पूर्वपक्षः (अद्वैत-शङ्का) [मूल संस्कृतम्] ननु ज्ञातज्ञापकं शास्त्रमप्रमाणमिति लोकसिद्धभेदस्य न श्रुतिप्रतिपाद्यत्वम्, अलोकसिद्धमभेदमेव श्रुतिर्बोधयतीति स एवाभिप्रेत इति चेत्? [हिन्दी अनुवाद] पूर्वपक्षी का आक्षेप: क्या यह सत्य नहीं है कि शास्त्र अज्ञात विषय का ज्ञापक होने पर ही प्रमाण होता है? जो बात लोक में पहले से सिद्ध हो, उसका निरूपण करना व्यर्थ है। संसार में सभी लोग जीव और ब्रह्म का भेद स्वाभाविक रूप से जानते ही हैं, अतः शास्त्र को अज्ञात अभेद की ही शिक्षा देनी चाहिए। इसलिए जीव और ब्रह्म का पूर्ण अभेद ही श्रुति का वास्तविक तात्पर्य होना चाहिए। सिद्धान्तः (श्रीगोविन्दभाष्यम्) [मूल संस्कृतम्] मैवम्; श्रुतिविरोधात्। तथा हि श्वेताश्वतरोपनिषदि (१.६) — 'पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति।' [श्रुत्यर्थः एवं व्याख्या] 'जीवात्मा अपने को नियामक (प्रेरयिता) परमेश्वर से पृथक् (भिन्न) जानकर तथा उनसे सेवित व सन्तुष्ट होकर ही अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त होता है।' [मूल संस्कृतम्] अभेदस्य चानुभूत्यभावेन शशशृङ्गतुल्यत्वेनालोकसिद्धत्वात्। लोकाप्रतीतेश्च न तादृश-कल्पना युक्ता। ये चामूष्वभेदपरा वादास्तेऽपि बादरायणेन साक्षादविरोधे निरसिष्यन्ते (सूत्र १.१.३०)। [हिन्दी अनुवाद] यह पूर्वपक्षीय विचार वैदिक श्रुतियों के प्रत्यक्ष विरुद्ध होने के कारण सर्वथा त्याज्य है। जीव और ब्रह्म की आत्यन्तिक एकता की अनुभूति किसी को भी नहीं होती; यह तो खरगोश के सींग (शश-शृङ्ग) के समान सर्वथा असत् एवं अवास्तविक कल्पना है। सामान्य जन भी इसे कभी स्वीकार नहीं करते। उपनिषदों में जहाँ कहीं अभेद-प्रतिपादक वाक्य आते हैं, उनका व्यक्तिगत (सविशेष) तात्पर्य सूत्रकार महर्षि वेदव्यास जी स्वयं आगे चलकर सूत्र १.१.३० में स्पष्ट करेंगे।

तृतीयाधिकरणम् — शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्

अधिकरण-प्रतिपाद्य-विषयः परमेश्वरस्य सर्वज्ञत्वं वेदैकगम्यत्वं च। (परम पुरुषोत्तम भगवान् केवल वैदिक शास्त्रों के द्वारा ही जाने जाते हैं।) ब्रह्मसूत्रम् — १.१.३ शास्त्रयोनित्वात् ॥ ३ ॥ [पदच्छेदः] शास्त्र — योनित्वात् (हेतौ पञ्चमी)। [सूत्रार्थः] शास्त्र (ऋग्वेदादि सकल वेद) की योनि (कारण अथवा प्रमाण) होने के कारण ब्रह्म सर्वज्ञ और जगत्कारण सिद्ध होता है; अथवा समस्त शास्त्रों के एकमात्र प्रमाणगम्य (योनि) होने से ब्रह्म शास्त्रैकगम्य है।